उत्तराखंड में चल रही सियासी लड़ाई के बीच राज्यपाल केके पॉल ने विधानसभा अध्यक्ष को संदेश भेजकर 28 मार्च को सरकार के शक्ति परीक्षण के दौरान सदन की व्यवस्था पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं। राज्यपाल ने हिदायत दी है कि बहुमत साबित करने की प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होनी चाहिए।

राज्यपाल ने यह भी साफ कहा है मत विभाजन का परिणाम तुरंत घोषित होना चाहिए और पूरी कार्यवाही को रिकॉर्ड किया जाए। राज्यपाल के इस संदेश से कई अफवाहों पर भी विराम लग गया है। अब यह भी साफ हो गया है कि सरकार को 28 मार्च को सदन में हर हाल में बहुमत साबित करना होगा।

इस चिट्ठी का एक संकेत यह भी है कि पूरे घटनाक्रम पर राजभवन नजर बनाए हुए है। यह चिट्ठी जारी करने के लिए राज्यपाल ने संविधान की धारा 175(2) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया है।

चिट्ठी में राज्यपाल ने 18 मार्च को सदन में हुए हंगामे के बाद बीजेपी के 26 और कांग्रेस के 9 विधायकों की ओर से की गई शिकायत का भी जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि राजभवन पहुंचे इन विधायकों के प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन सौंपकर वित्त विनियोग विधेयक-2016 पर सवाल उठाया था।

प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों का आग्रह था कि सदन में 35 सदस्यों की ओर से मत विभाजन की मांग करने के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी एक नहीं सुनी। इससे वित्त विनियोग विधेयक पर मत जाहिर करने का उनका अधिकार बाधित हुआ। यह भी दावा किया गया कि विधेयक के खिलाफ और उसके समर्थन में पड़ने वाले मतों को रिकॉर्ड नहीं किया गया।

पत्र में राज्यपाल ने कहा कि इस संदर्भ में 19 मार्च को मुख्यमंत्री हरीश रावत से कहा गया था कि जितनी जल्दी हो सके, लेकिन 28 मार्च के बाद नहीं, सदन में अपना बहुमत साबित करें।

चूंकि, 28 मार्च की विधानसभा अध्यक्ष ने सत्र आहूत किया था, इसलिए यह तिथि चुनी गई। इसके बाद 20 मार्च को एक और पत्र मुख्यमंत्री को भेजकर जितनी जल्द हो सके विश्वास मत हासिल करने का कहा गया था। राज्यपाल के मुताबिक मुख्यमंत्री ने इसके जवाब में बताया कि 28 मार्च को सदन में विश्वास मत हासिल कर लिया जाएगा।

राज्यपाल ने इस पत्र के माध्यम से विधानसभा से यह भी कहा कि 28 मार्च को विश्वास मत हासिल करने की प्रक्रिया शांतिपूर्ण और इस तरह की होनी चाहिए जिसमें लोकतंत्र की मूल भावना प्रतिबिंबित हो।