उत्तराखंड विधानसभा में 18 मार्च की शाम को जो कुछ हुआ, उसकी पटकथा को अंतिम रूप लगभग दो हफ्ते पहले ही दे दिया गया था। वैसे तो कांग्रेस के भीतर असंतोष की चिंगारी महीनों से सुलग रही थी, लेकिन इसमें अंतिम आहुति डालने की भूमिका निभाई रावत सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने। माना जा रहा है कि नब्बे के दशक में बीजेपी छोड़ने वाले हरक के पार्टी में पुराने संपर्कों ने इस घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महत्वपूर्ण बात यह कि इस सियासी उलटफेर में उत्तराखंड के बीजेपी सांसद भगत सिंह कोश्यारी के अलावा राज्य के किसी बीजेपी नेता का कोई रोल शुरुआत में नहीं रहा और महज दो दिन पहले ही चुनिंदा नेताओं को विश्वास में लेकर इस बारे में बताया गया।

कांग्रेस में विजय बहुगुणा खेमा और सतपाल महाराज के नजदीकी कुछ विधायक तो लगातार रावत सरकार से नाराज चल ही रहे थे, हालिया समय में इन्हें हरक सिंह रावत का नेतृत्व मिल जाने से सियासी बिसात पूरी तरह बिछ गई। हरक सिंह रावत मुंहफट और बेलाग बोलने वाले नेता हैं, लिहाजा पिछले लगभग एक महीने से उनके तेवरों में जो विद्रोह नजर आने लगा था, उससे सियासी गलियारों में तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।

हरक ने गैरसैंण के मुद्दे सहित अलग-अलग विषयों पर सरकार के स्टैंड के उलट बयान देकर संकेत दे दिए थे कि सत्तारूढ़ दल में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। हालांकि तब किसी को अंदेशा नहीं था कि अबकी बार उनकी नाराजगी बगावत के गुल खिला देगी।

मार्च की शुरुआत में हरक के तेवरों में और ज्यादा तल्खी भर गई। इस बीच नौ मार्च को विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने पर जिस तरह पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अचानक अस्थायी राजधानी देहरादून में अपनी सक्रियता बढ़ा दी, उससे भी राजनैतिक हलकों में सुगबुगाहट सुनाई देने लगी। सत्र के दौरान 11 मार्च को बजट पेश किया गया और देर शाम हरक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के साथ नई दिल्ली रवाना हो गए।

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सूत्रों के मुताबिक बीजेपी सांसद भगत सिंह कोश्यारी के जरिए हरक ने नई दिल्ली में मोदी कैबिनेट के एक वरिष्ठ मंत्री सहित कई केंद्रीय नेताओं से मुलाकात की। एक तरह से 11 व 12 मार्च को नई दिल्ली में उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के तख्ता पलट का पूरा खाका खींच लिया गया था।

सूत्रों के अनुसार हरक के नेतृत्व में सत्तापक्ष के कुल 14 विधायकों के नाम बगावत करने वालों में शामिल थे, लेकिन गुरुवार को इसकी भनक जब सरकार को लगी तो मुख्यमंत्री हरीश रावत ने डिजास्टर मैनेजमेंट शुरू किया।

गुरुवार रात बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय व प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू के देहरादून पहुंच जाने और सभी बीजेपी विधायकों को दो होटलों में ठहराए जाने से सरकार और भी सतर्क हो गई। नतीजतन, गुरुवार देर रात से लेकर शुक्रवार शाम, विनियोग विधेयक पर मतदान तक मुख्यमंत्री चार-पांच विधायकों को साधने में सफल रहे। स्थिति यह थी कि इधर सदन चल रहा था, उधर, मुख्यमंत्री सदन और अपने कार्यालय के बीच दसियों बार चहलकदमी कर चुके थे।

दरअसल, बीजेपी का प्लान पहले शुक्रवार सुबह ही सदन में सरकार गिराने का था। इसके लिए बीती रात कांग्रेस के बागी विधायकों के साथ बैठक भी हो गई थी। देर रात अचानक ही बागियों में से एक विधायक ने पाला बदलते हुए मुख्यमंत्री तक सारी बात पहुंचा दी। हालांकि सरकार को मामले की भनक पहले से ही लग चुकी थी, लेकिन इसने बीजेपी की योजना की पूरी तरह पुष्टि कर दी। इसके बाद मुख्यमंत्री समेत उनके समर्थक पार्टी नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए।