एक तरफ उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार प्रति व्यक्ति आय में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा वृद्धि होने का दावा कर रही है और दूसरी तरफ राज्य में कर्ज का मर्ज भी लगातार बढ़ता जा रहा है। 2016-17 में उत्तराखंड का कुल कर्ज बढ़कर 40793.69 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।

2015-16 में यह कर्ज 34762 करोड़ रुपये ही था। विजन 2020 की बात कर रही हरीश रावत सरकार को यह बात भी परेशान कर सकती है कि 2020 तक यह कर्ज बढ़कर 62 हजार करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। इससे विपक्ष के उस आरोप की पुष्टि होती दिख रही है, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि कांग्रेस सरकार कंबल ओढ़कर घी पी रही है।

कर्ज के मामले में सरकार के लिए चिंता की बात यह भी है कि उसका प्रारंभिक घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका मतलब यह भी हुआ कि सरकार जो नया कर्ज ले रही है, उसका अधिकतर हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में ही जा रहा है।

राज्य सरकार अभी तक कर्ज को चिंता वाली बात नहीं मानती रही है। कर्ज को विकास योजनाओं के लिए ग्रीस के रूप में पेश किया जाता रहा है। 2016-17 का बजट राज्य सरकार के इस दावे को झुठला भी रहा है। 2015-16 में राज्य का प्रारंभिक घाटा 721 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था। नया साल आते-आते यह संशोधित होकर 1646 करोड़ रुपये हो गया।

अब इस घाटे का 2176 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। सरकार ने पिछले साल कर्ज के ब्याज के रूप में 3102 करोड़ रुपये अदा किए थे और इस बार वह 3896 करोड़ रुपये अदा करने जा रही है। विशेषज्ञों की नजर में प्रारंभिक घाटा बढ़ने का मतलब है कि सरकार लिए गए कर्ज का सही उपयोग नहीं कर पा रही है।

राज्य सरकार के अपने अनुमान इसकी पुष्टि भी कर रहे हैं। वेतन, पेंशन और ब्याज पर इस बार करीब 18454 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पिछले साल सरकार ने इस मद में 14258 करोड़ रुपये खर्च किए थे। केंद्र से मिलने वाले पैसे में करीब दस प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। अपना कर राजस्व राज्य सरकार का करीब 17 प्रतिशत बढ़ेगा। जाहिर है कि अधिकतर पैसा वेतन और पेंशन में ही जाया होगा।