महिला दिवस पर खास : उत्तराखंड में यहां लड़के के पिता, लड़की के घरवालों को देते हैं दहेज

दहेज प्रथा को समाज में एक तरफ जहां कलंक माना जाता है, वहीं उत्तराखंड में एक समुदाय ऐसा भी हैं जहां दहेज के बिना विवाह संस्कार पूरा होना संभव ही नहीं है।

इस समुदाय में बेटियों के साथ नहीं बल्कि दूल्हे के घरवाले दहेज देते हैं। जंगलों में सदियों से रहने वाले वन गुर्जर जनजाति के लोग बेटे की शादी करने के लिए बेटी पक्ष को दहेज देते हैं।

हमारे देश की बहुरंगी परंपरा की इस फुलवाड़ी में बेटियों को अभिशाप नहीं समझा जाता, बल्कि बेटियों को वास्तविक लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है।

दरअसल, गुर्जर परिवारों में यदि किसी के घर बेटी ने जन्म लिया तो उनकी खुशी दोगुनी हो जाती है। इसकी एक वजह यह है कि उनके समुदाय में बेटियों को भार नहीं समझा जाता, बल्कि उन्हें समृद्धि का परिचायक माना जाता है।

कालागढ़ टाईगर रिजर्व के जंगलों और राजाजी नेशनल पार्क से लगे इलाकों में सदियों से निवास करने वाले वन गुर्जरों में वर पक्ष से दहेज लेने की परंपरा है।
कालागढ़ के रहने वाले वन गुर्जर मस्तू की मानें तो उनके परिवार में बेटियों के पैदा होने पर खुशी मनाई जाती है। उन्हें भार तो कतई नहीं समझा जाता।

मस्तू के मुताबिक जब उसकी शादी होती है तो दूल्हा पक्ष के लोग ही उनके घर पर हाथ मांगने आते हैं। लड़की का हाथ मांगने के ऐवज में दूल्हे पक्ष को परंपरा के मुताबिक लड़की पक्ष को पारितोषिक का भुगतान करना पड़ता है।

दरअसल, वन गुर्जरों में चली आ रही परंपरा के मुताबिक जन्म से लेकर शादी तक बेटी के पालन-पोषण में जितना भी खर्चा होता है, वह शादी के वक्त वर पक्ष को देना पड़ता है।

बेटियों को पशुधन की अच्छी देखभाल करने और परिवार को एकजुट होकर बांधने में वन गुर्जर की महिलाओं का कोई सानी नहीं है। क्योंकि जगंलों में कई दिनों तक बिना परिवार के मुखिया के भी महिलाएं अपने परिवार की अच्छी तरह से देखभाल कर लेती हैं।

हालांकि दहेज प्रथा को आज समाज का कलंक माना जाता है लेकिन वन गुर्जरों में ऐसा नहीं है। क्योंकि वन गुर्जर समुदाय में बेटियों से नहीं बल्कि बेटों से दहेज लिया जाता है।

इसके अलावा इस समुदाय में विवाह करने के लिए लड़की के बदले लड़की देनी पड़ती है। यदि वर पक्ष बदले में लड़की नहीं दे पाता है तो उसे घर जमाई बनकर रहना पड़ता है।