भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए सात दशक पूरे होने को हैं। इतने साल बीत जाने के बाद भी अस्थायी राजधानी देहरादून से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाई है। अंग्रेज जहां तक रेलवे ट्रैक का निर्माण छोड़ गए थे आज भी ट्रेन वहीं रुकी हुई हैं।

देहरादून रेलवे स्टेशन आज भी अंतिम रेलवे स्टेशन बनकर रहा गया है। ट्रेन पहाड़ों पर पहुंचाने के लिए अंग्रेज हमसे 100 साल पहले भी बेहतर थे। पहाड़ों पर सुरंगें बनाकर ट्रेन पहुंचाई जा रही थी। आज कई बुजुर्ग कहते हैं कि अगर अंग्रेज कुछ साल और भारत में रहते तो ट्रेन मसूरी तक कब की पहुंच जाती।

देहरादून रेलवे स्टेशन का निर्माण अंग्रेजों ने 1894 में शुरू किया था और साल 1899 में बनकर तैयार हो चुका था। 1899 के बाद अंग्रेज अफसर दिल्ली से सीधे देहरादून आने जाने लगे थे।

अंग्रेजों ने व्यापार और हुकुमत दोनों के लिए देहरादून रेलवे स्टेशन का भरपूर उपयोग किया। देहरादून रेलवे स्टेशन के निर्माण के बाद अब अंग्रेज अफसरों के लिए मसूरी और गढ़वाल रियासतों में जाना आसान हो गया था। लेकिन अपनी सोच और तकनीक के लिए विख्यात अंग्रेज अभी कहां रुकने वाले थे। अब अंग्रेज अफसर ट्रेन मंसूरी ले जाने के लिए योजना बनाने लगे थे।

अंग्रेज राजपुर रोड के किनारे से मंसूरी ट्रेन ले जाने के लिए खाका तैयार करने लगे थे। अंग्रेजों की तकनीक इतनी बेहतर थी कि उन्होंने राजपुर रोड से करीब 3 किमी. उंचाई पर एक सुरंग बनाई जहां से ट्रेन का ट्रेक मसूरी ले जाने की तैयारी की जा रही थी। अंग्रेजों के हौसले बुलंद थे, वे अगले दो साल के भीतर मसूरी तक ट्रेन ले जाने का सपना देख रहे थे।

अंग्रेजों ने यह योजना आज से करीब 100 साल से भी ज्यादा समय पहले बना डाली थी। क्योंकि सपना मसूरी ट्रेन ले जाने का बुना जा रहा था, लेकिन एक हादसे ने उनके काम की रफ्तार को रोक दिया।

closed-Tunnel

वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल बताते हैं कि सुरंग निर्माण के दौरान मिट्टी ढह जाने से कई मजदूरों की जान चली गई थी जिस कारण ट्रैक निर्माण का कार्य रुक गया। मामला कोलकाता हाईकोर्ट में भी चला, लेकिन मामला सुलझने तक अंग्रेज भारत छोड़ चुके थे और हमारे नेता उस हद तक जाकर सपना नहीं देख सकते थे।

साल 1947 में देश आजाद हुआ और देश में रेलवे ट्रैक बढ़ाने के लिए विकास कार्य शुरू हुए, लेकिन देहरादून का रेलवे स्टेशन वहीं थम चुका था, जहां अंग्रेज उसे छोड़ गए थे।

अंग्रेजों की ओर से मसूरी ट्रैक का पूरा सर्वे भी किया गया था। पूरा खाका तैयार हो गया था, लेकिन फिर भी हमारे नेता देहरादून से बाहर ट्रेन निकालने में नाकाम रहे। पहाड़ तो दूर उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र विकानगर को भी रेल मार्ग से नहीं जोड़ पाए।

train

अंग्रेजों ने जो सपना 100 साल पहले देखा था, उसे आज भी पूरा करने की क्षमता हमारे नेताओं में शायद नहीं है। 100 साल पहले भी अंग्रेजों की तकनाक हमसे बेहतर थी। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग और टनकपुर-बागेश्वर रेल मार्ग आज भी निर्माण की पहली सीढ़ी भी पार नहीं कर पाए हैं। लेकिन अंग्रेजों की बनाई सुरंग आज भी उनकी तकनीक और विजन को साफ बयां करती है।

सिर्फ देहरादून ही क्यों… अंग्रेजों ने उत्तराखंड में पहाड़ की जड़ तक जहां भी ट्रेन पहुंचाई आज भी वहीं तक रेल जाती है। आजादी के बाद लगभग 7 दशकों में वहां से ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी है। फिर चाहे वह रामनगर और काठगोदाम हो या टनकपुर, ऋषिकेश या कोटद्वार।