बसंत पंचमी मां सरस्वती की आराधना का महापर्व है जो ज्ञान, सद्बुद्धि, विवेक और यश प्रदान करने वाली देवी हैं। गुरुवार को बसंत पंचमी अनेक शुभ योग लेकर आई है जो आपके समस्त श्रेष्ठ कार्य सफल बनाएंगी। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि व अमृत योग का निर्माण हो रहा है। ये दोनों ही योग शुभ कार्यों के लिए अतिश्रेष्ठ होते हैं। इनमें किया गया कार्य निर्विघ्न संपन्न होता है।

बसंत पंचमी को देवी सरस्वती का पूजन कर शुभ कार्यों का श्रीगणेश करने से आपको सफलता मिलेगी। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी को देवी सरस्वती का उद्भव हुआ था। अत: हर साल यह दिन उन्हीं की वंदना करते हुए उनके शुभ गुणों को समर्पित किया जाता है।

बसंत पंचमी के दौरान मौसम भी सुहावना होता है। न ज्यादा सर्दी होती है और न गर्मी। तन और मन की प्रसन्नता के लिए यह मौसम बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। इसी समय प्रकृति भी अपने विविध रंगों से शृंगार करती है।

कब करें शुभ काम
पंडितों के अनुसार, पंचमी तिथि 12 फरवरी की मध्य रात्रि 2.32 तक रहेगी। 13 फरवरी को तिथि का क्षय हो रहा है। अत: शुभ कार्य व अनुष्ठान आदि 12 फरवरी को ही करने चाहिए।

दूसरी ओर, बसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से लेकर प्रात: 9.16 बजे तक भद्रा रहेगी। भद्रा में पूजन व शुभ कार्यों का निषेध किया जाता है। इसलिए मां सरस्वती का पूजन भद्रा समाप्ति के पश्चात ही करना चाहिए। पूजन के लिए श्रेष्ठ समय 9.30 बजे से होगा जो संपूर्ण दिन रहेगा।

बसंत पंचमी से कुछ और परंपराएं भी जुड़ी हैं। इसी दिन से होलिका निर्माण किया जाता है और फाल्गुन के गीत शुरू हो जाते हैं। यह दिन विद्या की देवी को समर्पित है। इसलिए बसंत पंचमी से बच्चों को अक्षर ज्ञान भी दिया जाता है।

जानिए वसंत पंचमी का महत्व
कड़कड़ाती ठंड के अंतिम पड़ाव के रूप में वसंत ऋतु का आगमन प्रकृति को वासंती रंग से सराबोर कर जाता है। अंगारों की तरह दिखते बुरांश और पलाश के फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, हरियाली से ढकी धरती और गुलाबी ठंड की इस ऋतु का हिंदू धर्म के लिए बहुत महत्व है।

माघ के महीने की पंचमी को वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। मौसम का सुहाना होना इस मौके को और रूमानी बना देता है। वसंत पंचमी को श्री पंचमी तथा ज्ञान पंचमी भी कहते हैं। अमेरिका में रहने वाले बंगाली समुदाय के लोग इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन वे सरस्वती पूजा का विशेष और वृहद आयोजन करते हैं जिसमें वहां का भारतीय समुदाय शामिल होता है।

कामदेव की ‘मार’ : वसंत कामदेव का मित्र है, इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। इस धनुष की कमान स्वरविहीन होती है। यानी जब कामदेव कमान से तीर छोड़ते हैं तो उसकी आवाज नहीं होती है। कामदेव का एक नाम ‘अनंग’ है यानी बिना शरीर के यह प्राणियों में बसते हैं। एक नाम ‘मार’ है यानी यह इतने मारक हैं कि इनके बाणों का कोई कवच नहीं है। वसंत ऋतु को प्रेम की ही ऋतु माना जाता रहा है। इसमें फूलों के बाणों से आहत हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है।

गुनगुनी धूप, स्नेहिल हवा, मौसम का नशा प्रेम की अगन को और भड़काता है। तापमान न अधिक ठंडा, न अधिक गर्म। सुहाना समय चारों ओर सुंदर दृश्य, सुगंधित पुष्प, मंद-मंद मलय पवन, फलों के वृक्षों पर बौर की सुगंध, जल से भरे सरोवर, आम के वृक्षों पर कोयल की कूक ये सब प्रीत में उत्साह भर देते हैं। यह ऋतु कामदेव की ऋतु है। यौवन इसमें अंगड़ाई लेता है। दरअसल वसंत ऋतु एक भाव है जो प्रेम में समाहित हो जाता है।

दिल में चुभता प्रेमबाण : जब कोई किसी से प्रेम करने लगता है तो सारी दुनिया में हृदय के चित्र में बाण चुभाने का प्रतीक उपयोग में लाया जाता है। ‘मार’ का बाण यदि आपके हृदय में चुभ जाए तो आपके हृदय में पीड़ा होगी। लेकिन वह पीड़ा ऐसी होगी कि उसे आप छोड़ना नहीं चाहोगे, वह पीड़ा आनंद जैसी होगी। काम का बाण जब हृदय में चुभता है तो कुछ-कुछ होता रहता है।

इसलिए तो वसंत का ‘मार’ से संबंध है, क्योंकि काम बाण का अनुकूल समय वसंत ऋतु होता है। प्रेम के साथ ही वसंत का आगमन हो जाता है। जो प्रेम में है वह दीवाना हो ही जाता है। प्रेम का गणित मस्तिष्क की पकड़ से बाहर रहता है। इसलिए प्रेम का प्रतीक हृदय के चित्र में बाण चुभा बताना है।

बसंत से जुड़ी खास बातें…

  • इस दिन बच्चों को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है।
  • पितृ तर्पण किया जाता है।
  • कामदेव की पूजा की जाती है
  • विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।
  • पहनावा भी परंपरागत होता है। पुरुष कुर्ता-पायजामा में और स्त्रियां पीले या वासंती रंग की साड़ी पहनती हैं।
  • गायन और वादन सहित अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं जो सरस्वती मां को अर्पित किए जाते हैं।