उत्तराखंड सरकार और आबकारी विभाग की गलत आबकारी नीतियों ने सरकार को गहरा झटका दे दिया है। राज्य गठन के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब आबकारी विभाग अपने राजस्व प्राप्ति के लक्ष्य से काफी पीछे रह गया। नामी शराब कंपनियों के ब्रांड तो शराब माफिया ने अपने लालच के चलते बाजार से गायब करा दिए। इधर, शराब तस्करों से पकड़ी गई शराब भी उन्हीं ब्रांड की थी, जो बाजार से गायब थी।

पहली बार आबकारी नीति और एफएलटू नीति को अलग-अलग लाकर सरकार ने बडे़ करिश्मे का दावा किया, लेकिन जमीनी स्तर पर तो जैसे रायता फैल गया। आबकारी विभाग के ही आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2008-09 में 501 करोड़ लक्ष्य के सापेक्ष 528 करोड़, 2009-10 में 598 करोड़ के सापेक्ष 703 करोड़ की राजस्व वसूली हुई।

वहीं 2010-11 में 686 करोड़ की तुलना में 755 करोड़ और 2011-12 में 727 करोड़ के सापेक्ष 843 करोड़ वसूले गए। आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 में 942 करोड़ की तुलना में 1117 करोड़, 2013-14 में 1150 करोड़ के सापेक्ष 1268 करोड़ रुपये वसूले गए। वित्तीय वर्ष 2014-15 में 1400 करोड़ की तुलना में 1433 करोड़ वसूले गए। जबकि चालू वित्तीय वर्ष 2015-16 में 1800 करोड़ में से 31 दिसंबर 1365 करोड़ की वसूली की जा सकी है।

अब कम वसूली को लेकर सरकार के साथ-साथ विभाग के आला अफसर भी परेशान हैं। हालांकि अधीनस्थ अधिकारी आला अफसरों को भरोसा दिला रहे हैं कि लक्ष्यों को हासिल कर लिया जाएगा, लेकिन तीन माह में 435 करोड़ की वसूली कैसे करेंगे, यह ठीक-ठीक नहीं बता पा रहे हैं।