आजादी के 68 साल गुजर जाने के बाद भी उत्तराखंड के पौड़ी जिले में आज भी बहुत से इलाके ऐसे हैं जहां के ग्रामीणों ने अपने सांसद का चेहरा तक नहीं देखा है। दरअसल यहां लोगों को पहाड़ काटकर अपने गांव तक सड़क पहुंचाने वाले बिहार के ‘दशरथ मांझी’ जैसे ही किसी व्यक्ति का इंतजार है, क्योंकि सरकारें और अधिकारी को कानों में रुई डालकर बैठे हैं।

दरअसल, मूलभूत सुविधाओं के आभाव से जूझ रहे इन इलाकों की जमीनी हकीकत यह है कि यहां आज भी मीलों पैदल दूरी तय करके पहुंचना पड़ता है। बीरोखाल ब्‍लॉक का बंदरपूछ-केदारगली ऐसा ही इलाका है, जहां आजादी के क्या मतलब है यहां के निवासियों को आज तक नहीं मालूम।

हालांकि ऐसा नहीं है कि यहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने समय-समय इस इलाके को भी मूलभूत सुविधाओं से जोड़ने की मांग न की हो, लेकिन कानों में रुई डाल कर अपने दफ्तरों में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों तक उनकी आवाज आज तक नहीं पहुंच पाई है।

केदारगली निवासी लोगों की मानें तो देश का कोई ऐसा जनप्रतिनिधि नहीं है जिसके सामने उन्होंने अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर लिखित शिकायत न की हो, लेकिन उन शिकायतों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस इलाके के पिछड़ेपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां आज भी विकास की किरण इन ग्रामीणों को कहीं पर नजर नही आई है। गांव में यदि कोई बीमार हो जाता है तो उसको चारपाई में लिटा कर 5-10 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचना पड़ता है।

इतना ही नहीं, सरकार की ओर से चलाई जा रही निशुल्क टीकाकरण की सुविधा के लिए भी इस क्षेत्र के ग्रामीणों को सैकड़ों रुपये खर्च करके उस सुविधा का लाभ उठाना पड़ रहा है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र को सड़क मार्ग से जोड़ने की कोशिश न की गई हो, लेकिन वन कानूनों के चलते ग्रामीणों की मांग सरकारी विभागों की फाइलों में ही दफन हो कर रह गईं। इसके चलते जिस क्षेत्र को छह किलोमीटर दूरी से जोड़ा जा सकता था, उसके लिए ग्रामीणों को 40 किलोमीटर का फेर लगाना पड़ रहा है।