कंडाली (सिसौंण) की सब्जी का लुत्फ लेना चाहते हैं तो इंदिरा अम्मा कैंटीन में करें भोजन

जिस कंडाली (सिंसौंण) के नाम से पूरे शरीर में सिहरन उठ जाती है, उसी सब्जी और कापली को लोग खूब पसंद कर रहे हैं। इंदिरा अम्मा भोजनालय में कंडाली की सब्जी को मीनू में शामिल किया गया है। इसे सप्ताह में एक दिन बनाया जा रहा है।

रुद्रप्रयाग में इन दिनों इंदिरा अम्मा भोजनालय में लोग चैंसा (चैंस), भटवाणी (भट की चुड़काणी), गथवाणी, गहथ की दाल, रैंस की दाल का स्वाद ले रहे हैं।

दूध गंगा उत्पादन समिति मेदनपुर की ओर से संचालित भोजनालय में स्थानीय उत्पादों से बना भोजन परोसा जा रहा है। समिति ने अब कंडाली की सब्जी व कापली को भी मीनू में शामिल कर लिया है।

गांव से ही जरूरत के हिसाब से सिसौंण भोजनालय तक पहुंचाया जा रहा है। सिसौंण के कोमल कोपलों को काटकर इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद इन्हें हल्की आंच में जलाया जाता है। इससे इनका कांटा खत्म हो जाता है।

इसके बाद इसे उबालकर गूंथा जाता है। मेथी, धनिया के छौंक के साथ सब्जी या कापली बनाई जाती है।

जीआईसी रतूड़ा के विज्ञान विषय के शिक्षक धीरेंद्र सिंह बर्तवाल ने बताया कि कंडाली, अर्टिकासिएसिया फेमिली में आता है। इसे अंग्रेजी में स्पेईंग नेटल कहा जाता है। जबकि इसका वानस्पतिक नाम अर्टिका डायोइसिया है।

दवा के क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है। यह गंजेपन को दूर करने के साथ ही त्वचा रोग, जोड़ों के दर्द में भी उपयोग में लाई जाती है। इसमें फोरिक ऐसिड काफी मात्रा में पाई जाती है।

कंडाली को सर्दियों में शरीर में गर्माहट के लिए सब्जी व कापली के रूप में खाया जाता है।