सांकेतिक तस्वीर

प्राकृतिक आपदा ने जिन लोगों को गहरे घाव दिए, शासन प्रशासन की संवेदनहीनता के चलते अब वो घाव अब नासूर बन गए हैं। आपदा की मार झेल चुके चंबा से सटे बागी मैठाण गांव का आज तक भी विस्थापन नहीं हो पाया है और ग्रामीण अपने टूटे-फूटे मकानों में जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

15 अगस्त 2014 को आसमान से बरपे कहर ने बागी मैठाण गांव में जो कहर बरपाया उससे एक खुशहाल और खेती के लिए मशहूर गांव तबाह हो गया। तीन जगहों पर बादल फटने की घटना से 21 परिवार प्रभावित हुए, सैकड़ों नाली कृषि भूमि तबाह हो गई और दर्जनों पशु आपदा की भेंट चढ़ गए।

हालांकि किसी तरह की जनहानि नहीं हुई, लेकिन ग्रामीणों का घर और उनकी रोजी-रोटी का सहारा उनकी कृषि भूमि, पशु और घराट खत्म हो गए। प्रभावित ग्रामीण कुंवर सिंह का कहना है कि शासन प्रशासन की ओर से विस्थापन सहित तमाम घोषणा हुई, लेकिन आज तक फाइल शासन प्रशासन में घूम रही है।

राहत के नाम पर प्रभावितों को 25 से 50 हजार तक के चेक बांट दिए गए, लेकिन मूल समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ। अपनी खुशहाली और खेती के लिए जाना जाने वाला बागी मैठाण गांव आज मलबे और टूटे-फूटे मकानों में तब्दील हो गया है। आपदा की दृष्टि से संवेदनशील बागी मैठाण गांव का सर्वे भी हुआ, रिपोर्ट भी बनी, लेकिन एक साल बाद भी विस्थापन की कार्रवाई नहीं हुई।

ग्रामीणों की खेती भूमि तबाह हो जाने से आज प्रभावितों के सामने बेरोजगारी का संकट भी खड़ा हो गया है, जिससे ग्रामीण अब गांव से पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। जिलाधिकारी ज्योति नीरज खैरवाल का कहना है कि जिले के आपदा के लिहाज से 24 संवेदनशील गांवों की रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है, शासन स्तर पर ही विस्थापन को लेकर फैसला लिया जाना है।

अतीत को याद कर आज भी प्रभावित ग्रामीणों के आंसू छलक उठते हैं, लेकिन उनके आंसू पोंछने वाला शायद कोई नहीं है। जिनसे उम्मीदें थी, वो सिर्फ घोषणाओं तक ही सीमित रहे और जिनको घोषणाएं पूरी करनी थी वो सिर्फ आश्वासन तक। ऐसे में बागी मैठाण के ग्रामीण पहले आपदा की तो अब पत्थर दिल सरकार व अधिकारियों की मार झेल रहे हैं।