लोक साहित्य में लोहड़ी की उत्पत्ति के बारे में बहुत कुछ लिखा है, तथापि लोहड़ी का मुख्य विषय लोहड़ी का सांस्कृतिक उत्सव मकर संक्रांति के विश्वास में निहित है। लोहड़ी वर्ष के सबसे छोटे दिन मनायी जाती है। इस पर्व की मुख्य विशेषता उत्सवाग्नि (बॉनफायर) से ही है।

विश्वभर में सर्दियों में अग्नि जलाकर उत्सव मनाने की प्रथा है। यह पर्व बड़े दिनों के आगमन की भी सूचना देता है। कुछ के लिए अग्नि जलाकर सर्दी को भगाने का पर्व है। कुछ के लिए धार्मिक है तो कुछ के लिए मात्र परम्परा है।

पंजाबी लोग यह त्योहार सर्दियों के अंत होने पर व मकर संक्रांति के पूर्व मनाते हैं। लोहड़ी का संबंध भारतीय कैलेंडर के विक्रमी संवंत से जुड़ा है। यह त्योहार पंजाबी संस्कृति से अधिक जुड़ा लगता है, शायद इसलिए कि पंजाबी ज्यादा उत्सव प्रेमी, हृष्ट-पुष्ट सशक्त उर्जस्वी, उत्साही, प्रसन्नचित जाति के लोग होते हैं। इसी नाते लोहड़ी की महत्ता उनके उत्सव मनाने के प्रेम व प्रसन्नचित चुलबुलेपन और उल्लासमय प्रदर्शन का संकेत देती है।

लोहड़ी के दिन सुबह से ही उत्सव मनाने के लिए बच्चे घर-घर लोहड़ी की ‘लूट’ पैसों के रूप में कुछ खाने योग्य तिल, लड्डू, गुड़, मूंगफली व अन्य मीठे जैसे गजक, रेवड़ी गाने गाकर इक्टठे करते हैं। वे दुल्हा भट्टी वाला यानी पंजाबियों के अनुसार रॉबेन हुड जो अमीरों से लूटकर गरीबों की सहायता करता था। और एक बार दयनीय गांव की एक मजबूर लड़की का विवाह अपनी ही बहन की तरह करवाया था, इसी को लोग गाना गाकर प्रशंसा करते हुए त्योहार मनाते हैं।

लोहड़ी उपजाऊपन व जीवन के उत्साह का उत्सव है यह पर्व घर में कोई नई शादी या नव आगंतुक (नये बच्चे) के पैदा होने की खुशी में परिवार में खान-पान व भांगड़ा आदि करके मनाया जाता है।

आजकल लम्बे अरसे मेहनत करते हुए थकने पर थोड़ा विश्राम आपस में एक-दूसरे से मिलकर हंसी-खुशी से खाते-पीते अग्नि के आगे नाचगान कर मनाते हैं। लोहड़ी, पोंगल, मकर संक्रांति, उत्तरायण के ये सभी पर्व एकता व भाईचारे का संदेश देते हुए धरती पर भगवान की कृपा को प्राप्त करने के रूप में मनाए जाते हैं।