हरिद्वार जिला पंचायत चुनाव परिणामों ने बीजेपी के विधानसभा चुनावों को लिए मिशन 2017 को जोर का झटका दे दिया है। राज्य की राजनीति में बसपा एक बार फिर गेम चेंजर की भूमिका में आती दिख रही है। सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए भी ये नतीजे काफी अच्छे नहीं तो कम से कम संतोषजनक तो कहे ही जा सकते हैं।

अभी तक जिला पंचायत की 47 में से 44 सीटों के नतीजे सामने आए हैं, जिनमें से बसपा को 14, कांग्रेस को 13 और महज 2 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली है। 15 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी है।

हरिद्वार के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव एक तरह से 2017 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सेमी फाइनल माने जा रहे हैं। ऐसे में जब हरिद्वार जिले की 11 विधानसभा सीटों में से 5 पर बीजेपी काबिज हो और बीजेपी के ही पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हरिद्वार से सांसद हों, बीजेपी के लिए ये नतीजे खतरे की घंटी है।

भले ही लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में लोकसभा की पांचों सीटों बीजेपी की झोली में गई हों, लेकिन उसके बाद से ही निरंतर पांच विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी को लगातार मात खानी पड़ी है। सितारगंज, डोईवाला, सोमेश्वर, धारचूला और मानकपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को हर बार पटखनी दी।

नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के लिए इस हार के भार को संभालना और अपने सांसद समेत विधायकों की जिम्मेदारी तय करना और भी मुश्किल होगा। 2017 के फाइनल से पहले राज्य में किसी भी पार्टी के लिए अपने वजन को तौलने के लिए यह एक मात्र चुनाव था। कांग्रेस पर हावी होने की कोशिश कर रही बीजेपी के लिए निश्चित ही यह बड़ा झटका है। बीजेपी हाईकमान के साथ-साथ पार्टी के रणनीतिकारों के लिए हरिद्वार के उपचुनाव में मिली इस हार को पचाना फिलहाल मुश्किल होगा।

हरिद्वार पंचायत चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उत्तराखंड की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। फिलहाल बेशक हरिद्वार की 11 विधानसभा सीटों में से बसपा के खाते में मात्र दो सीटें हों, लेकिन त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बसपा ने कांग्रेस को पछाड़ते हुए बीजेपी को पानी पिला दिया।

हरिद्वार में बसपा लगातार दो बार जिला पंचायत पद पर काबिज रही है। हरिद्वार के जिला पंचायत चुनाव नतीजों को देखते हुए कहा जा सकता है कि बसपा एक बार फिर स्थानीय चुनाव में ही नहीं बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव में भी एक बार गेम चेंजर की भूमिका में आ सकती है।

2011 के विधानसभा चुनाव में भले ही बसपा को 3 सीटें मिलीं हों, लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने विधानसभा की 8 सीटों पर जीत हासिल कर सबको चौंका दिया था। राज्य में निर्दलीयों के सहारे ही कांग्रेस सत्ता का स्वाद चखती रही है। हरिद्वार पंचायत चुनाव के बाद भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। अभी तक के चुनाव नतीजों को देखा जाए तो निर्दलीयों ने सर्वाधिक सीटों पर जीत हासिल की है।

बेशक कांग्रेस ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया है, फिर भी कांग्रेस, बसपा के बाद तीसरे स्थान पर है। संभव है निर्दलीय, सत्तधारी पार्टी के साथ जाएं। अगर ऐसा होता है तो जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर कांग्रेस का कब्जा हो सकता है। मौके की नजाकत को देखते हुए बसपा के सदस्य भी कांग्रेस के साथ मिल सकते हैं।

जिस तरह से बीजेपी, सीडी कांड और शराब नीति को लेकर कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है, इन चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस फिर से बीजेपी पर हमलावर हो सकती है। कांग्रेस का खुद का प्रदर्शन इन चुनाव में लचर रहा, लेकिन बीजेपी की बदतर स्थिति ने राज्य की सियासत में कांग्रेस को फिलहाल बढ़त जरूर दिला दी है।