काठमांडू।… नेपाल में चार क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन से बने मधेसी मोर्चे में फूट पड़ गई है। देश में नए संविधान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे संयुक्त लोकतांत्रिक मधेस मोर्चे में शामिल एक मुख्य घटक दल सद्भावना पार्टी ने तराई क्षेत्र में अलग से आंदोलन चलाने का आह्वान किया है।

सद्भावना पार्टी अभी कुछ समय पहले तक भारतीय सीमा के पास केंद्रित आंदोलनों को वापस लेने के खिलाफ थी। उसके नेता राजेंद्र महतो सीमावर्ती इलाकों में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। लेकिन, अब पार्टी ने नीति बदल ली है।

संघीय समाजवादी फोरम के अध्यक्ष उपेंद्र यादव ने सद्भावना पार्टी के फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा, ‘सद्भावना को प्रदर्शन का एकतरफा फैसला नहीं करना चाहिए था। यह गलत है।’ महतो 26 दिसंबर को बिराटनगर में पुलिस से झड़प में घायल हो गए थे। भारत के गुड़गांव में मेदांता अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।

सद्भावना पार्टी ने रविवार को प्रदर्शन के कई कार्यक्रमों का एकतरफा ऐलान किया। पार्टी ने कहा है कि वह प्रदर्शन में मारे गए लोगों की याद में प्रार्थना सभा, अनशन, हस्ताक्षर अभियान और सोशल मीडिया के जरिए मधेसी आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय रूप देने जैसे अहिंसक उपायों का सहारा लेगी।

सूत्रों का कहना है कि संयुक्त लोकतांत्रिक मधेस मोर्चा सोमवार को अपनी बैठक में भारत-नेपाल सीमा पर से नाकाबंदी हटाने और सीमा पर प्रदर्शन को रोकने का ऐलान कर सकता है। मोर्चे की बैठक में प्रदर्शन के तौर तरीकों पर चर्चा होगी।

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ताजा राजनैतिक घटनाक्रमों ने आंदोलनकारी दलों की राजनैतिक सूझबूझ पर सवाल उठा दिया है। आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि सद्भावना पार्टी के अलग प्रदर्शन के फैसले से चार महीने पुराना यह आंदोलन कमजोर होगा।

मधेसी मोर्चा पर नाकाबंदी हटाने का भारी दबाव है। इसकी वजह से नेपाल में जरूरी चीजों की कमी से हाहाकार मचा हुआ है। मोर्चे के नेताओं का कहना है कि नाकाबंदी हटाने का सद्भावना पार्टी का ‘अप्रत्याशित फैसला’ इसलिए लिया गया है क्योंकि इससे राजेंद्र महतो यह जताना चाहते हैं कि उनकी पार्टी अकेली नहीं थी, जिसने नाकाबंदी हटाने पर आपत्ति उठाई थी।

उधर, महतो का आरोप है कि मोर्चे के नेता काठमांडू में समय बिताना पसंद करते हैं। जमीनी स्तर पर प्रदर्शन को नेतृत्व देने में उनकी रुचि नहीं है।