भारतीय संसद फाइल फोटो

भारतीय संसद भवन की इमारत 88 साल पुरानी है। इस गुबंदनुमा गोल इमारत के मजबूत आकाशगामी स्‍तंभों में देश का एक सदी का इतिहास छुपा हुआ है। जो इमारत कभी इस देश का गौरव और इस शहर की शान हुआ करती थी, आज अचानक ही जन कौतुहल का विषय बन गई है। जी हां जनाब! कहना है कि देश की राजनीतिक अस्थिरता, धीमी आर्थिक प्रगति, सामाजिक असहनशीलता और धार्मिक असहिष्‍णुता जैसी तमाम मुश्किलात की वजह यह इमारत हो सकती है।

देश का बुद्धिजीवी वर्ग ज्‍योतिष, वास्‍तुशास्‍त्री, आर्किटेक्‍ट, इंजीनियर आदि इसी विषय वस्‍तु के इर्द-गिर्द विचार-विमर्श और आकलन में उलझे हैं। यह भी एक इत्‍तेफाक है कि अभी चंद रोज पहले ही देश के प्रधनमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने अफगान संसद का उद्घाटन किया था और इसके कुछ दिन बाद ही लोकसभा स्‍पीकर सुश्री सुमित्रा महाजन द्वारा संसद भवन के पुनर्निमाण की बात ने इस कौतुहल को जन्‍म दे दिया।

क्‍या वाकई देश का संसद भवन देश की तकदीर बदल सकता है। वाकई संसद भवन की इमारत में कई वास्‍तुदोष हैं, जो कि राजनीतिक अस्थिरता और देश की धीमी आर्थिक प्रगति सहित कई सामाजिक समस्‍याओं का कारण हो सकते हैं।

वास्तु विशेषज्ञ नरेश सिंगल ने स्‍पष्‍ट किया कि संसद भवन एक त्रिकोणाकार भूखंड पर बना हुआ है, जिसके तीनों ओर मार्ग हैं और इसका आकार जिसे गोल बताया जा रहा है, वास्‍तव में पूर्णतरू गोल नहीं है। वास्‍तु हो या चाइनीज विद्या फेंग्‍शुई दोनों के ही अनुसार ऐसी इमारत दोषपूर्ण है। फेंग्‍शुई के अनुसार त्रिकोणाकार भूखंड अग्नि का प्रतिनिधित्‍व करता है, जबकि गोलाकर इमारत धातु यानी मेटल का। इस आधार पर देखा जाए तो यह अग्नि के ऊपर रखा धातु का टुकडा है। यह विदित है कि अग्नि धातु को पिघला देती है और शायद यही वजह है कि देश आजादी के इतने सालों बाद भी राजनीतिक स्थिरता के लिए जूझ रहा है।

भारतीय संसद भवन का विन्‍यास अंग्रेज आर्किटेक्‍ट सर हरबर्ट बेकर ने तैयार किया था। आलोचकों ने इसकी आलोचना करते हुए इसे हरबर्ट बेकर का एक बुरा तजुर्बा करार दिया था। कहा यह भी जाता है कि अंग्रेज नहीं चाहते थे कि आजादी के बाद भारत राजनीतिक स्थिरता पा सके, इसीलिए इस इमारत को दोषपूर्ण बनाया गया।

बहरहाल, अगर इसके वास्‍तु विन्‍यास की समीक्षा की जाए तो संसद भवन में व्यावस्‍थापिका के लिए तीन अर्ध-गोलाकार चेम्‍बर बनें हैं जबकि ठीक मध्‍य में लाइब्रेरी है। जिसपर एक 27.4 मीटर ऊंचा एक विशालकाय गुंबद है। जिसका व्‍यास 174 मीटर है और यह कुल 2.02 हेक्‍टैयर मीटर क्षेत्र को कवर करता है। सदनों के अर्ध गोलाकार होने के कारण सांसद सीधे स्‍पीकर की नजरों के दायरे में नहीं आते। यही नहीं, स्‍पीकर जहां बैठते हैं उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर होता है। चूंकि स्‍पीकर सदन की अगुवाई करता है। इस हिसाब से उनके बैठने का स्‍थान भी वास्‍तु सम्‍मत नहीं है। ऐसे में सदस्‍यों के बीच एकमत बनाए रखना स्‍पीकर के लिए मुश्किल होता है, जिसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण हम आए दिन देखते हैं।

यही नहीं, देश के ज्‍यादातर प्रधानमंत्रियों के दुख:द करियर विराम या अंत का कारण भी ऐसी दोषयुक्‍त हो सकती है। बात चाहे लाल बहादुर शास्‍त्री, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के दुख:द अंत की हो या फिर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, नरसिम्‍हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह के दुख:द करियर विराम की। ये सारे तथ्‍य संसद भवन के वास्‍तु दोष युक्‍त होने की ओर इशारा करते हैं।

वास्‍तु के जरिए इस समस्‍या का निदान किया जा सकता है। कहावत है कि जो होता है अच्‍छा ही होता है। हो सकता है स्‍पीकर सुत्री महाजन द्वारा संसद भवन की इमारत के पुर्ननिर्माण की अनुशंसा किया जाना देश के लिए आने वाले अच्‍छे दिनों की ओर इशारा कर रहा हो। वास्‍तु के अनुसार त्रिकोणाकर भूखंड को चौरस किया जा सकता है। इसके बाद संसद भवन के पुनर्निमाण में वास्‍तु विशेषज्ञ की सलाह से त्रुटियों को दूर कर एक मजबूत इमारत को साकार किया जाना चाहिए। ऐसी इमारत जो सही मायने में विश्‍व शक्ति बनने का देश का सपना साकार करने में मददगार हो।

यह लेख मशहूर ज्योतिष, वास्तु और फेंग्शुई विशेषज्ञ नरेश सिंगल से बातचीत के आधार पर लिखा गया है। वास्तु से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या के समाधान के लिए नरेश सिंगल से संपर्क करें…

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