क्रिसमस के मौके पर पेशावार कांड़ के महानायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की 125वीं जयंति को पूरा देश धूम-धाम के साथ मना रहा है। आज के ही दिन 25 दिसम्बर 1891 को जंग-ए-आजादी के इस महानायक का जन्म पौड़ी जिले के थलीसैंण ब्लॉक के मासी, रौणीसेरा में हुआ था। शुरू से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा पाले वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली 11 सितम्बर 1914 को गढ़वाल राइफल में भर्ती हुए।

पहले विश्व युद्ध में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने साथियों के साथ यूरोप और मध्य पूर्व क्षेत्र में हुई लड़ाई में भाग लिया था। 1930 में वीर चन्द्र गढ़वाली की बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म मिला।

पेशावर के किस्साखानी बाजार में 23 अप्रैल 1930 को जब खान अब्दुल गप्फार खान अपने साथियों के साथ एक आम सभा कर रहे थे तो वीर चन्द्र सिंह और उनकी 72 गढ़वाली सैनिकों की एक टुकड़ी को अग्रेजों ने गोलियां चलाने का आदेश दिया, लेकिन कैप्टेन रिकेट के आदेश को दरकिनार करते हुए वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने गढ़वाली सैनिकों को सीज फायर का आदेश देकर अंग्रेजों के खिलाफ पहले सैनिक विद्रोह का विगुल फूंक दिया।

अग्रेंजों के आदेश को न मानने वाले गढ़वाली सैनिकों को पेशावर में ही नजरबंद कर दिया गया और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, जबकि हवलदार 253 वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को मृत्युदण्ड की जगह आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। करीब 15 साल बाद 1945 में जब वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जेल से रिहा हुए तो उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर आजादी के अनेक आंदोलनों में शिरकत की।

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स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के बाद भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली चुप नहीं बैठे और समाज की कुरुतियों के खिलाफ वह सड़कों पर अकेले ही लड़ते रहे। पृथक राज्य उत्तराखंड़ के लिए भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली हमेशा लड़ते रहे और पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में ही बनाने की पैरवी करते रहे।

जंग-ए-आजादी का यह महानायक आम आदमी के अधिकारों की लड़ाई लड़ते-लड़ते 1 अक्टूबर 1979 को हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कर गया था।