उत्तराखंड के आपदा प्रभावित जिलों में नदियों के कटान के प्रबंधन को लेकर मंथन शुरू हो गया है। विश्व बैंक के करीब 60 करोड़ के प्रोजेक्ट को लेकर सोमवार को सरकार में प्रजेंटेशन के साथ मंथन हुआ।

इसमें राज्य की पांच नदियों में कटाव के स्थान और उनसे होने वाले नुकसान को लेकर काफी मंत्रणा की गई। प्रोजेक्ट के तहत नदियों की जलधारा से संभावित कटाव वाले स्थानों का ट्रीटमेंट किया जाएगा।

गंगा, भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी और धौलीगंगा नदियों के किनारों में करीब 588 किलोमीटर के स्ट्रैच पर पानी के बहाव से कटान का अध्ययन और उसके ट्रीटमेंट को लेकर प्रोजेक्ट के तहत काम किया जाएगा। इसमें विश्व बैंक पूरी तरह से फंड की मदद करेगा।

साल 2013 में राज्य में आई आपदा के बाद से आपदा के नुकसान को कम करने और बचाव को लेकर लगातार नए नए प्रोजेक्ट्स पर काम किया जा रहा है। इसी के तहत अब नए सिरे से विश्व बैंक की मदद से नदियों के कटाव वाले क्षेत्रों का अध्ययन करके उनका ट्रीटमेंट करने की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं।

प्रोजेक्ट को लेकर सोमवार को सचिवालय में आपदा प्रबंधन सचिव अमित नेगी की अध्यक्षता में एक बैठक और प्रजेंटेशन हुआ, जिसमें आपदा प्रभावित जिलों उत्तराकाशी, चमोली, टिहरी और रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी भी शामिल हुए, आपदा प्रभावित पांचवें जिले पिथौरागढ़ को लेकर भी बैठक में मंथन किया गया।

प्रोजेक्ट के तहत तीन चरणों में नदियों के कटाव वाले स्थानों पर अध्ययन और डीपीआर का काम किया जाएगा। अपर सचिव आपदा प्रबंधन विभाग सी. रवि शंकर का कहना है कि पूरा प्रोजेक्ट करीब 22 महीने का मानकर चला जा रहा है, लेकिन इसका प्री-ट्रीटमेंट का काम करीब 6 से 8 महीने में पूरा किया जाएगा।

माना जा रहा है कि नदियों के बहाव से होने वाले कटाव के संवेदनशील स्थान चिन्हित करके ट्रीटमेंट करने से भविष्य के खतरों को टाला जा सकेगा। प्राथमिक अनुमान के आधार पर कहा जा रहा है कि इन नदियों के किनारे कई आबादी क्षेत्र भी संवेदनशील जोन में आ गए हैं, जिनको विस्थापित किया जाना एक कठिन काम है। वहीं नदियों की कटाव की स्थिति को देखते हुए ट्रीटमेंट करने देना एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है।