उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष को लेकर बीजेपी में माथापच्ची अब भी जारी है। इस बीच लगता है कि पार्टी में ‘खंडूड़ी हैं जरूरी’ पर एक बार फिर मुहर लगती दिख रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी एक बार फिर 2017 में उत्तराखंड के चुनावी समर में खंडूड़ी के नाम से साथ मैदान में उतरेगी। क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत की काट के तौर पर बीजेपी खंडूड़ी की साफ छवि को लेकर मैदान में उतरेगी।

आखिर क्यों अब भाजपाइयों को फिर से जनरल खंडूड़ी के बनाए नियम कायदों की याद आ रही है। आखिर क्या वजह कि खंडूड़ी पर कांग्रेस के हमले के बाद ही बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ चौतरफा मोर्चा खोल दिया है।

लोकसभा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी पर हरीश रावत के मीडिया सलाहकार की टिप्पणी के बाद बीजेपी बुरी तरह से बौखला गई है। पार्टी ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ चौतरफा मोर्चा बोल दिया है।

खासतौर से खंडूड़ी के लोकायुक्त के मुद्दे पर बीजेपी ने कांग्रेस को आरोपों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहां बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर मुख्यमंत्री और उनके मीडिया सलाहकार के खिलाफ हमला बोला, वहीं बंद कमरे में बीजेपी दिग्गजों ने भी सरकार के खिलाफ आंदोलन की रणनीति भी तैयार की।

खंडूड़ी पर कांग्रेस के हमले के बाद से बीजेपी की अंदरुनी राजनीति में मची हलचल के भी कई मायने निकाले जा रहे हैं, जिसमें सबसे अहम ये है कि जनरल खंडूड़ी की स्वच्छ और पारदर्शी छवि और उनका जनता के बीच उनकी लोकप्रियता ही अब बीजेपी की चुनावी नैया को पार लगाने का एकमात्र विकल्प है।

देहरादून से लेकर दिल्ली तक जिस तरीके से पूर्व मुख्यमंत्री जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी के लोकायुक्त कानून को सराहा गया और पार्टी ने भी उसे जनता के बीच जाकर भुनाने की पूरी कोशिश की, उसने भी खंडूड़ी की पार्टी फोरम में अपनी अलग ही छवि बनाई।

ये अलग बात है कि बीजेपी की आपसी गुटबाजी और एक गुट का छत्रप होने का टैग भी खंडूड़ी की राह में रोड़ा बनता रहा लेकिन अब फिर से बीजेपी को जनरल खंडूड़ी के बनाए कानूनों और नियमों की याद सताने लगी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद जनरल खंडूड़ी ने फर्श में पड़ी पार्टी को अर्श तक ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और 2012 विधानसभा चुनाव में पार्टी का ग्राफ 10 सीटों से बढ़ाकर 31 सीटों तक जा पहुंचाया। शायद यही वजह है कि अब बीजेपी को भी जनता के बीच जनरल साहब की स्वच्छ छवि ही मौजूदा सरकार का एकमात्र विकल्प नजर आ रहा है।