एक ओर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार देशभर में स्मार्ट सिटी का ख्वाब दिखा रही है, तो दूसरी ओर उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार अब स्मार्ट विलेज की तैयारी में है। स्मार्ट विलेज पर बात करते हुए मुख्यमंत्री ने दलील दी है कि इससे रोजगार के साथ ही राज्य में पलायन पर ब्रेक लगाने में मदद मिलेगी।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भूवन चंद्र खंडूड़ी का कहना है कि अगर इसमें गंभीरता है तो अच्छी बात है, लेकिन महज घोषणा का कोई मतलब नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के देश में स्मार्ट सिटी के समानांतर मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखंड में आधा दर्जन स्मार्ट विलेज की सोच रहे हैं।

इस कड़ी में राज्य सरकार ने उत्तराखंड में आधा दर्जन स्थानों को चयनित किया है, जहां निजी स्तर पर निवेशकों की मदद से स्मार्ट विलेज या स्मार्ट टाउन बनाए जाएंगे। मुख्यमंत्री हरीश रावत का दावा है कि इससे सुविधाएं मुहैया होंगी और पलायन पर भी ब्रेक लगेगा।

मुख्यमंत्री का कहना है सरकार ने यह कवायद शुरू कर दी है। उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ ठीक रहा, तो उतराखंड का यह प्रयोग अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।

गौरतलब है कि राज्य गठन के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में दस हजार से ज्यादा घर खाली हो गए हैं, यानी अपने उत्तराखंड में सुविधाओं के अभाव मे पलायन का सिलसिला न सिर्फ बदस्तूर जारी है, बल्कि अलग राज्य बनने के बाद बढ़ा ही है। जहां पहले लोग सुविधाओं की खातिर उत्तर प्रदेश के बड़े नगरों की ओर पलायन करते थे, तो अब उत्तराखंड बनने के बाद पहाड़ के लोग देहरादून, उधमसिंहनगर और हरिद्वार या हल्द्वानी में बस रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी इस सोच को सिरे से तो नहीं नकार रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि सरकार का मकसद गंभीरता की बजाए महज वाहवाही लूटने पर ज्यादा रहता है।