सरकारी मशीनरी की कछुआ चाल देखनी हो तो कभी उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून स्थित सचिवालय आ जाएं। अभी तक तो आम लोग ही सरकारी अधिकारियों पर कछुआ चाल से काम करने का आरोप लगाते थे, अब स्वयं मुख्यमंत्री हरीश रावत भी खुलेआम ये आरोप लगा रहे हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकारी फाइलों को लटकाने में सचिवालय कर्मचारियों-अधिकारियों ने डॉक्टरेट हासिल कर ली है।

सचिवालय के चक्कर काट-काट कर आम व्यक्ति जूते घिस रहा है और खुद सूबे के मुखिया भी मुहर लगा रहे हैं कि सचिवालय में नाकारा लोगों की फौज बैठी है। प्रांतीय चिकित्सा संघ के शपथ ग्रहण समारोह के मौके पर भी मुख्यमंत्री अपनी बेबसी और आम आदमी के दर्द को छुपा नहीं पाए।

डॉक्टरों को बेहतर कामकाज का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते मुख्यमंत्री पहुंच सचिवालय पहुंच गए और रोजमर्रा के कामकाज के लिए सचिवालय की चौखट पर नाक रगड़ते आम आदमी के दर्द को बयां करने लगे।

बता दें कि ये हाल उस नवोदित राज्य का है, जिसके बजट का दो-तिहाई पैसा इन्हीं सरकारी कर्मचारियों और अफसरों की तनख्वाह और पेंशन चुकाने में निपट रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री के दर्द पर एक्शन की बजाए सचिवालय कर्मचारी और अधिकारी उन्हीं को नसीहत दे रहे हैं कि मुख्यमंत्री साहब धीरे बोलिए, ऐसा बयान किसी भी कर्मठ कर्मचारी या अफसर के मनोबल पर हथौड़ा साबित हो सकता है।

अब मुख्यमंत्री से जनता का सवाल होगा कि क्या बयानबाजी से एक कदम आगे बढ़कर आप उन नाकारा कर्मचारियों और अफसरों की जवाबदेही तय करेंगे?