कोशिशें सफल रहीं तो जल्द ही कुमाऊं और गढ़वाल के इतिहास को कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकेगा। इसके लिए बाकायदा तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के कुलपति ने बताया कि उत्तराखंड का इतिहास अपने आप में गौरव प्रदान करने वाला है, जो संस्कृति संवर्धन को भी समेटे हुए है।

कुलपति एचएस धामी ने कहा है कि मलेथा में माघो सिंह भंडारी, कुमाऊं के तिलू रौतेली और राजूला मालूसाई ने जो कुछ किया, नई पीढ़ी उसे भूलने लगी है। लिहाजा, विश्‍वविद्यालय अन्य गतिविधियों के साथ यहां के इतिहास को भी छात्रों के बीच ले जाने का काम करेगा।

इसके साथ ही पहाड़ की परंपराओं और लोक गाथाओं की भी जानकारी युवाओं को दी जाएगी। मालूम हो कि कुमाऊं विश्‍वविद्यालय के सिलेबस में लंबे समय से कुमाऊं और गढ़वाल के इतिहास को शामिल करने की मांग की जा रही थी। अब जाकर उम्‍मीद जगी है कि यह मांग पूरी होगी।