अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण अलग ही पहचान रखने वाले टिहरी गढ़वाल के पांचवे धाम कहे जाने वाले बूढ़ाकेदार में भगवान शिव के बूढ़े स्वरूप के दर्शन होते हैं। यहीं पर भगवान शिव के परम उपासक कैलापीर देवता की भी पूजा अर्चना होती है।

हर साल कैलापीर देवता का ऐतिहासिक मेला लगता है। 500 सालों से चली आ रही इस अनोखी परम्परा में शरीक होने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में गोरखाओं के साथ हुए युद्ध में गढ़वाल के राजाओं को उनकी हार होती दिखाई दी, तो उन्होंने भगवान शिव की पूजा अर्चना की और उनके सपने में भगवान शिव ने गुरू कैलापीर की पूजा अर्चना करने को कहा, जिसके बाद गुरू कैलापीर के आर्शीवाद और मदद से गढ़वाल के राजाओं ने गोरखाओं के साथ युद्ध में विजय हासिल की।

मंदिर के मुख्य पुजारी प्रभुदास का कहना है कि ये युद्ध दीपावली के समय हुआ था तो क्षेत्रीय लोगों ने दीपावली नहीं मनाई और दीपावली के एक महीने बाद जब राजा विजयी होकर लौटे तब स्थानीय लोगों ने उनके साथ दीपावली का त्यौहार भी मनाया और गुरू कैलापीर देवता को धन्यवाद स्वरूप उनके नाम पर तीन दिन की पूजा अर्चना कर भव्य मेले का आयोजन किया।

तीन दिनों तक चलने वाले गुरू कैलापीर देवता के मेले का शुभारंभ पहले मुख्यमंत्री को करना था, लेकिन मौसम की खराबी के चलते मुख्यमंत्री नहीं पहुंच पाए। मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में पर्यटन मंत्री दिनेश धनै ने मेले का शुभारंभ किया।

इस मेले में गुरू कैलापीर के दिव्य त्रिशूल के दर्शन होते हैं और भक्तों का हुजूम इस त्रिशूल को लेकर दौड़ता है। कहा जाता है कि बूढ़ाकेदार क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति केदारनाथ यात्रा पर नहीं जाता है, क्योंकि स्वंय भगवान शिव यहां बूढ़े स्वरूप में विराजमान हैं। कैलापीर देवता भी केदारनाथ नहीं गए और शिव भगवान की यहीं पूजा अर्चना की।

श्रद्धालु ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए भक्तजन दूर दराज के करीब 180 गांवों से लोग यहां पहुंचते हैं और कैलापीर देवता से आर्शीवाद लेते हैं। ऐतिहासिक परम्परा और धार्मिक आस्था के चलते टिहरी गढ़वाल में भगवान शिव और नारायण को कई ऐसे रूप में पूजा जाता है जो शायद ही कहीं और देखने को मिलता हो। तभी तो भगवान शिव के बूढ़े स्वरूप के दर्शन करने और कैलापीर देवता का आर्शीवाद लेने दूर दराज से भक्त लाखों की संख्या में यहां पहुंचते हैं।