टिहरी बांध को देश की बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया और इसके लिए हजारों ग्रामीणों को अपनी जमीन से भी बेदखल होना पड़ा। इसके बावजूद भी टिहरी जिले के कई गांव आज भी अंधकार में जी रहे हैं।

एशिया की सबसे बड़ी झीलों में शामिल टिहरी झील पर बना टिहरी डैम भले ही देश के कई राज्यों को रोशन कर रहा हो, लेकिन टिहरी जिले के ही कई क्षेत्र गेंवाली, पिंसवाड़, गंगी ऐेसे हैं जहां आज भी अंधकार है।

जब राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो गेंवली के ग्रामीणों ने खुद ही इस अंधकार को दूर करने का जिम्मा उठाया और एक मिसाल कायम की। टिहरी जिले के सबसे सीमान्त गांवों में से एक है गेंवाली, जो टिहरी जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर सड़क मार्ग और फिर 10 किलोमीटर पैदल दूरी पर स्थित है।

अति सीमान्त क्षेत्र होने के कारण इस क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं गया और विकास की राह में ये क्षेत्र पिछड़ता चला गया। आजादी के बाद से गेंवाली के लोग अंधेरे में जीवन यापन कर रहे थे और उन्हें आस थी कि कभी तो यहां बिजली आएगी। कितनी ही सरकारें यहां पर बदली लेकिन बिजली यहां तक नहीं पहुंची।

गेंवाली के ग्राम प्रधान बच्चन सिंह का कहना है कि 1999 में आपसी सहमति और संसाधनों को जुटाकर गांव से अंधेरा दूर करने की ओर कदम उठाया और साल 2001 में एक निजी संस्था की मदद से ग्रामीणों ने 25 किलोवाट की एक पन विद्युत परियोजना का निर्माण किया, जो अब पूरे गांव को रोशन कर रही है।

गेंवाली के ग्रामीणों की मेहनत का फल है कि क्षेत्र के करीब 200 लोग आज इस परियोजना का लाभ उठा रहे हैं। करीब 15 साल से ग्रामीणों द्वारा ही इसके रखरखाव और मरम्मत का काम किया जा रहा है। बिना सरकारी अनुदान और सहायता के गेंवाली के लोग खुद की बिजली बनाकर इसका उपयोग कर रहे हैं, जो अन्य क्षेत्रों के लोगों के लिए एक मिसाल है।

जिलाधिकारी ज्योति नीरज खैरवाल ने ग्रामीणों के इस कदम को सराहनीय बताते हुए कहा है कि वह इस क्षेत्र का दौरा करेंगी और इस तरह की परियोजनाओं को अन्य जगह भी किस तरह उपयोग में लाया जा सकता है इसके लिए ग्रामीणों से बात करेंगी।

अति सीमान्त क्षेत्र गेंवाली के ग्रामीणों की ये पहल बड़े बांधों और परियोजनाओं की जगह गांवों में छोटी-छोटी विद्युत परियोजनाओं की ओर राज्य सरकार का ध्यान खींच सकती है, जिससे कि बड़ी परियोजनाओं से होने वाले दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है और उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने का सपना भी पूरा हो सकता है।