नैनीताल का इतिहास आज तक आपने जो भी पढ़ा या सुना होगा उसके अनुसार बताया जाता है कि अंग्रेजों ने नैनीताल की खोज की। इतिहास में चीजों को किस तरह से तोड़-मरोड़कर या अपने पक्ष में अंग्रेजों ने लिखा और आजादी के बाद भी उसे दुरुस्त करने की कोशिश नहीं की गई, उसका खुलासा यहां पढ़ें…

दरअसल नैनीताल को अंग्रेजों ने खोजा नहीं, बल्कि बसाया था। अंग्रेजों के यहां आने से पहले यह पूरी विरासत नर सिंह थोकदार की थी। जिसे अंग्रेजों ने धोखे से उनसे छीन लिया था। वर्तमान में नर सिंह थोकदार (बोरा) के वंशज ज्योलीकोट में रहते हैं। 1953-54 में अंग्रेज यहां से चले गए।

इतिहासकारों का मनना है कि नैनीताल के नगरीकरण के लिए अल्मोड़ा से अंग्रेजों द्वारा यहां लाए गए मोतीराम साह के वंशज ही अब नैनीताल के पुश्तैनी निवासी हैं। बाकी बसावट बाहरी लोगों की है।

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प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और इतिहासकार प्रो. अजय रावत बताते हैं कि नैनीताल की झील का जिक्र स्कंद पुराण में ‘त्रि ऋषि सरोवर’ नाम से है। पहले कैलाश मानसरोवर यात्री इसी मार्ग से जाते थे और वापसी टनकपुर से होती थी, तभी मानसरोवर की परिक्रमा को पूरा माना जाता था। उन्होंने बताया कि नैनीताल के बारे में जानकारी अंग्रेजों के आने से पहले से ही थी।

अंग्रेज अफसर ट्रेल 1823 में पहली बार यहां आया। उसे यह जगह अच्छी लगी। वह धार्मिक प्रवृत्ति का था और भारतीय संस्कृति से काफी प्रभावित था। पाषाढ़ देवी मंदिर उसी ही स्थापित किया, लेकिन उसने अंग्रेजों को इसकी भनक नहीं लगने दी। उसे शंका थी कि अंग्रेज इसकी खूबसूरती को बिगाड़ देंगे।

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1841 में पी. बैरन ने यहां आने के बाद आगरा अखबार में नैनीताल के बारे में लेख प्रकाशित किया। तब वह अंग्रेजों को यहां लाया। बैरन नैनीताल के मालिकाना हकदार नर सिंह थोकदार को नाव में बैठाकर आधे तालाब तक ले गया और नाव हिला दी। कहा कि पूरी संपत्ति हमारे हवाले कर दो, अन्यथा तुम्हें डुबा दिया जाएगा।

इस तरह यह संपत्ति जबरदस्ती कब्जे में ली गई। बाद में नगरीकरण के लिए अंग्रेज अल्मोड़ा से मोतीराम साह को यहां लाए। अधिकांश निर्माण मोतीराम साह द्वारा किया गया। अब नैनीताल में मोतीराम साह के एक-दो परिजन ही रहते हैं।

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