उत्तराखंड को अलग राज्य बने भले 15 साल हो गए हैं, लेकिन मसूरी के जौनपुर क्षेत्र के 24 से अधिक गांव के लोग आज भी पहाड़ जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

कई गांवों में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था नहीं होने से लोग परेशान हैं। ग्रामीण आज भी 10-15 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं।

पहाड़ों की रानी मसूरी से लगे जौनपुर में मसराना-किमोई गांव मोटर मार्ग 2006 में आठ किलोमीटर स्वीकृत हुआ था। तत्कालीन राज्य मंत्री कौलदास ने बकायदा मोटर मार्ग का शिलान्यास भी किया, लेकिन नौ साल में सड़क नौ इंच आगे नहीं बढ़ पाई। ग्रामीणों का सड़क का सपना आज भी अधूरा ही है।

गांव में बीमार लोगों को आज भी कुर्सी पर बैठाकर सड़क मार्ग तक पहुंचाया जाता है। कई लोग गांव में दम तोड़कर दुनिया छोड़ गए हैं। वहीं जब सड़क के निर्माण को लेकर क्षेत्रीय विधायक महावीर रांगड़ से बात की गई तो विधायक ने कहा कि मार्ग के निर्माण को लेकर कार्रवाई आगे बढ़ी है। मोटर मार्ग ईको सेंसटिव जोन में होने से मार्ग के निर्माण में अड़चन आ रही है।

सड़क की मांग को लेकर केन्द्रीय वन एंव पर्यावरण मंत्री से भी बात की गई है। बता दें कि अंग्रेजों ने जिस मसूरी में 1907 में बिजली और सड़क पहुंचा दी थी। आज उसी मसूरी से लगे दो दर्जन गांवों में सड़क तक नहीं पहुंच पाई है। उत्तराखंड राज्य निर्माण की लड़ाई पहाड़ के विकास को लेकर शुरू हुए थी, लेकिन आज भी पहाड़ के लोग विकास के लिए तरस रहे हैं।

उत्तरांचल टुडे के नियमित पाठक विनोद कुमार जोशी ने हमारे साथ यह जानकारी साझा की है कि ये हाल केवल मंसूरी का ही नहीं बल्कि अल्मोड़ा के लमगड़ा विकास खण्ड के विषौद पट्टी का भी है। जहां पर 2006 से चायखान धारखोला मोटरमार्ग 3 कि.मी. भी तैयार नहीं हुआ है।