सांकेतिक तस्वीर

दिल्ली में विभत्स निर्भया कांड के बाद देशभर में रेप पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाने में कोताही नहीं बरतने के दावे और वादे तो खूब हुए, लेकिन पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए अब तक ऐसा कुछ खास हुआ नहीं।

उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून में रेप के एक मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ हाईकोर्ट का स्टे लाने वाले आरोपी बीजेपी नेता को स्टे खारिज करवाकर गिरफ्तार करने के बजाए पुलिस ने खामोशी साध ली। यहां तक कि आरोपी के खिलाफ अकाट्य वैज्ञानिक सबूत, आरोपी और गर्भ के डीएनए का मिलान तक नहीं कराया गया। सबसे दुख की बात तो यह है कि अविवाहित पीड़ित गर्भवती है और अब इतना वक्त गुजर चुका है कि गर्भपात करवाना भी संभव नहीं है।

इस मामले में वर्तमान स्थिति क्या है, एएसपी सदानंद दाते से सवाल किया गया तो उन्होंने जांच अधिकारी ललिता तोमर से पूछकर बताया कि अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया गया। एसपी सिटी से आरोपपत्र के तथ्यों की जानकारी ली गई तो पता चला कि अभी तक आरोपपत्र स्वीकृति के लिए सीओ ऑफिस ही नहीं पहुंचा है।

अब अगर यह सच है तो बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह झूठ क्यों? इधर, पीड़िता की मां का कहना है कि पुलिस में जाना ही उनकी सबसे बड़ी गलती रही है, क्योंकि इंसाफ तो नहीं मिला, बदनामी जरूर मिल गई। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारी बिनब्याही बिटिया जब बच्चे को जन्म देगी तो हम लोगों से क्या कहेंगे?

एफआईआर के मुताबिक देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र की पीड़िता अपनी मां के साथ बीजेपी नेता मनीष वर्मा के आवास पर घरेलू काम करती थी। वर्मा की पत्नी की शिक्षा विभाग में नौकरी लगने के कारण बच्चों की देखभाल के लिए नौकरानी की बेटी को रख लिया था। नौकरानी ने 18 अगस्त को एसएसपी से मिलकर शिकायत दी थी कि बीजेपी नेता ने उसकी बेटी के साथ रेप किया और चुप रहने के लिए धमकाया भी।

दहशत की वजह से बेटी चुप्पी साधे रही। तबीयत बिगड़ने पर उसे दून अस्पताल ले जाया गया तो पता चला कि बेटी गर्भवती है। एसएसपी के आदेश पर 20 अक्टूबर को बीजेपी नेता और उसकी पत्नी के खिलाफ पटेलनगर कोतवाली में मुकदमा दर्ज हुआ।

पुलिस ने मामले को जांच में उलझाए रखा और आरोपी अपनी पत्नी की तरफ से हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्टे लेने में कामयाब हो गया। अब तक पुलिस ऐसी कोई कार्रवाई नहीं कर पाई, जिससे पीड़ित को राहत मिल सके। यह स्थिति तब है कि जबकि पीड़ित धारा 164 के तहत अपने बयान दर्ज करा चुकी है।

पीड़ित परिवार में पुलिस के रवैए पर भारी आक्रोश है। पीड़ित की मां का कहना है कि पुलिस में जाना ही उनकी सबसे गलती रही है, क्योंकि उन्हें इंसाफ तो नहीं मिला, बदनामी जरूर मिल गई। पूरा परिवार ऐसे भंवरजाल में फंसा है, जिससे निकलना बेहद कष्टकारी है। आरोप है कि पुलिस उन्हें न्याय दिलाने के बजाए आरोपी पक्ष को राहत देने में ज्यादा तवज्जो दिखाई। यही वजह है कि जांच को उलझाकर रखा गया।

दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए पुलिस ने पीड़ित के गर्भ में पल रहे भ्रूण का डीएनए मिलान करने में भी रुचि नहीं दिखाई। इस मामले में पीड़ित पक्ष की पैरोकारी कर रही नजमा खान का कहना है कि आरोप साबित करने के लिए इससे अच्छा माध्यम कोई नहीं हो सकता है। कई बार कहने के बाद भी जांच अधिकारी ने उनकी बात को तवज्जो नहीं दी है।