देहरादून।… उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन को रोकने के राज्य सरकार के प्रयासों को गति देने के लिए अब स्वयंसेवी संगठनों ने भी आगे आकर इस दिशा में आंकलन, विचार और सुझाव इकट्ठा करना शुरू कर दिया है। चमोली जिले में स्थित एक गैर सरकारी संगठन ‘उत्तरांचल युवा एवं ग्रामीण विकास केंद्र’ द्वारा जुटाए जा रहे आंकणों के मुताबिक, पिछले काफी समय से पहाड़ में जारी पलायन की रफ्तार साल 2013 में आयी आपदा के बाद और तेज हो गई।

आपदा के बाद केवल चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र से ही करीब 50 परिवार कहीं और पलायन कर चुके हैं। पलायन की खबरें अल्मोड़ा, बागेश्वर और पौड़ी तथा अन्य जिलों से भी आती रही हैं। इस विषय पर शनिवार को देहरादून में हुई एक गोष्ठी के दौरान भी राज्य के विभिन्न स्वयं सेवी समूहों ने पलायन पर चिंता प्रकट करते हुए इसे रोके जाने के संबंध में सुझाव दिए।

ऋषिकेश स्थित स्वयं सेवी समूह श्रीजगदंबा समिति की पहल पर हुई इस गोष्ठी के जरिए उत्तराखंड के बुद्धिजीवी वर्ग और सरकार को एक मंच पर इकट्ठा करने के प्रयास शुरू किए गए, जिससे यह पता लगाया जा सके कि पलायन को रोकने के लिए क्या कदम कारगर हो सकते हैं।

जगदंबा समिति के अध्यक्ष लक्ष्मी प्रसाद सेमवाल ने कहा, ‘हमारा प्रयास रहेगा कि हम ऐसी गोष्ठियां और करवाएं तथा सरकार और बुद्धिजीवियों के विचार मंथन से निकलने वाले सुझावों को इकट्ठा करें जो पलायन की समस्या को दूर करने में सहायक हों।’

सहकारिता सचिव विजय ढौंडियाल ने बताया कि सरकार बहुत जल्द उत्तराखंड में मौजूद संसाधनों की मैपिंग कराएगी, जिससे जिससे यह पता चल सके कि इन संसाधनों को वैल्यू एडीशन के जरिए किस प्रकार से बढ़ावा दिया जा सकता है।

इस संबंध में ढौंडियाल ने उत्तराखंड में होने वाली मंडुए की फसल का उदाहरण देते हुए कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि उससे किस प्रकार के व्यंजन और बिस्कुट जैसे खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। ढौंडियाल ने इस संबंध में कहा कि को-ऑपरेटिव के बंद पड़े शीतगृहों का उपयोग पहाड़ के उत्पादों के लिए किया जा सकता है। उत्तराखंड के सेब उत्पादक बी.पी. उनियाल ने कहा कि सरकार को पहाड़ के उत्पादों की बिक्री के लिए एक विशेष मंडी की स्थापना करनी चाहिए।

हाल ही में ‘गांव बचाओ’ आंदोलन की अगुवाई करने वाले देहरादून स्थित गैर सरकारी संगठन ‘हैस्को’ के अध्यक्ष पदमश्री अनिल जोशी ने कहा कि सरकार को अपना ध्यान गांवों की समस्याओं को दूर करने के साथ ही वहां मौजूद संसाधनों के उपयोग पर केंद्रित करना चाहिए, जिससे पलायन की समस्या भी दूर होगी।

हाल ही में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने घोषणा की है कि पारंपरिक कृषि उत्पादों मंडुआ, झंगोरा, अनारदाना, काला भट्ट, गहथ, चौलाई, मिर्च, सेब, माल्टा, नींबू, नाशपाती आदि के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिसके लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य और बोनस राशि देने का भी निर्णय लिया है।

एक अन्य फैसले में सरकार ने पेठा, लौकी, कद्दू तथा तुमड़ी आलू के लिए क्रय केंद्र खोलने की भी घोषणा की है। एक अन्य प्रयास में सरकार ने डेयरी क्षेत्र को सशक्त किए जाने के प्रयास भी शुरू कर दिए हैं।