देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। साल 1906 में वह मसूरी आए थे। तभी से वह दून और मसूरी के अतुलनीय सौंदर्य से सम्मोहित हो गए थे। यहां पर नेहरू ने जेल में रहकर बाकायदा सजा भी काटी।

हरिद्वार मार्ग स्थित नेहरु वार्ड (अब संस्कृति विभाग द्वारा संरक्षित धरोहर) है। यहां पर पहले जेल थी जो अब यहां से शिफ्ट हो गई है। जवाहर लाल नेहरू यहां पर 1932, 1933 और 1934 में कुछ-कुछ अंतराल में कैद हुए।

इसी दौरान उन्होंने भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) के कई अंश भी लिखे। इसके बाद 1941 में भी उन्हें कैद कर यहां रखा गया था। यहां पर आम का पेड़ आज भी है। चांदनी रोशनी में वह इस पुस्तक के अंश लिखा करते थे। आज भी यहां पर नेहरू जी का स्नानागार, रसोई, शौचालय मौजूद है। साथ ही वह कमरा भी है जहां देश का महानायक सोया करता था।

मेज, कुर्सी, पलंग तथा वह चद्दर तथा टेबल क्लाथ भी है। लोग उनसे मुलाकात करने आते थे जिसपर सरकार ने बाद में रोक लगा दी थी। शुक्रवार को नेहरू स्मारक को खूब सजाया गया।

मृत्यु से एक दिन पहले 26 मई को बच्चों के प्यारे चाचा जवाहर लाल नेहरू देहरादून आए थे। वह यहां के सर्किट हाऊस में कुछ देर के लिए रुके। उसके बाद वह और इंदिरा गांधी और अन्य परिजन सहस्त्रधारा गए।

यहां गंधक के जल और धारा में उन्होंने स्नान किया। आज जो लोक निर्माण विभाग का गेस्ट हाउस है वहां पर उन्होंने विश्राम किया और भोजन भी वहीं किया। यहां से वह दिल्ली गए।

27 मई को सुबह छह बजे तीन मूर्ति भवन में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। दोपहर दो बजे के करीब उनकी मृत्यु हो गई थी। पर दुखद बात यह है कि अभी तक किसी सरकार ने वहां पर कोई स्मारक नहीं बनवाया है। बहुत कम लोगों को पता है कि नेहरू यहां अंतिम बार आए थे। जबकि कांग्रेस की सरकारें यहां रहीं हैं।

उत्तराखंड का देहरादून स्थित राजभवन राज्य निर्माण से पहले सर्किट हाउस था। यह सर्किट हाऊस चाचा नेहरू को बेहद प्रिय था। जब भी वह देहरादून या मसूरी आते तो यहीं ठहरते थे। यहां का बागीचा उन्हें बेहद पसंद था। वह हमेशा कहते थे कि इस सर्किट हाउस का स्वरूप नहीं बदला जाए।

पं. नेहरू को हिमालय से अत्यधिक प्रेम था। इसलिए उन्होंने अपनी विरासत में यह उल्लेख किया था कि मृत्यु के बाद उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित हों। लेकिन साथ ही हिमालय में बिखेरी भी जाएं, यही वजह है कि उनकी राख समूचे उत्तराखंड में हैलीकाप्टर के जरिए बिखेरी गई।

राजपुर में सांई मंदिर से पहले जवाहर लाल नेहरू की भांजी व लेखिका नयनतारा सहगल का निवास स्थान है। अपने जीवन काल में पं. नेहरू व पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यहां आते रहे थे।

कांग्रेस भवन जिसे आज राजीव भवन कहते हैं उसके बमुश्किल पचास कदम की दूरी पर जवाहर लाल नेहरू की मूर्ति है। पर यह बदहाल है। लेकिन कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद शायद किसी छोटे बड़े कांग्रेसी ने इसकी कभी फिक्र भी की हो।