केदारनाथ आपदा के ढाई साल बाद भी नहीं बने झूलापुल, जान हथेली पर रखकर सफर कर रहे लोग

केदारनाथ आपदा को ढाई साल हो चुके हैं, लेकिन आपदा प्रभावितों की समस्याएं अब भी कम नहीं हो पाई हैं। आपदा के दौरान मंदाकिनी नदी की तेज लहरों में बहे 14 झूलापुलों में एक भी झूलापुल अब तक नहीं बन पाया है। वहीं प्रभावित लोगों को मजबूरन खतरे की ट्रॉली से सफर करना पड़ रहा है।

आपदा को बीते हुए लंबा समय हो गया है। मगर पीड़ितों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। आपदा के दौरान केदारघाटी के 14 झूलापुल मंदाकिनी की तेज लहरों में समा गए थे लेकिन अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों को दिए गए आश्वासनों के अलावा एक भी झूलापुल बनकर तैयार नहीं हो पाया।

जहां पर झूलापुलों का निर्माण होना है, वहां सिर्फ बेस खड़ा करके छोड़ा गया है। केदारघाटी के अन्तर्गत संगम, सिल्ली, विजयनगर, चन्द्रापुरी, सौड़ी, कुंड, कालीमठ, कालीशिला सहित 14 झूलापुल ऐसे हैं, जिनका निर्माण कार्य आज तक पूरा नहीं हो पाया है।

आपदा प्रभावित रमेश भट्ट ने बताया कि झूलापुलों के अलावा आपदा के ढाई साल बाद केदारनाथ यात्रा के मुख्य पड़ाव गौरीकुंड बाजार की हालात भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं है। गौरीकुंड में किसी भी प्रकार के पुनर्निर्माण के कार्य नहीं हो पाए हैं। गौरीकुंड के लिए मात्र कोरे आश्वासन दिए जा रहे हैं, जबकि गौरीकुंड सैकड़ों तीर्थ यात्रियों की आस्था से जुड़ा होने के साथ ही केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है।

गौरीकुंड बाजार की सुरक्षा के लिए मंदाकिनी नदी के दोनों ओर सुरक्षा दीवारों के निर्माण की मांग भी होती रही है। साथ ही गौरीमाई मंदिर, तर्पणकुंड एवं गर्मकुण्ड के भी पुनर्निर्माण की जरूरत बताई जा रही है। विपक्ष तो मुखर है ही साथ ही सत्तापक्ष की विधायक भी कहती हैं कि ठेकेदारों की लापरवाही से यह सब हो रहा है, जिस पर जांच की जरूरत है।

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने कहा कि एक तरफ सरकार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण की योजनाओं पर काम कर रही है तो वहीं विभागों की सुस्ती और लापरवाही पुनर्निर्माण कार्यों पर भारी पड़ रही है, जिसका खामियाजा स्थानीय जनता को भुगतना पड़ रहा है।