उत्तराखंड में कुर्मांचल के लोग अपनी लोक कलाओं को सहेजने का हुनर अच्छी तरह से जानते हैं। यही वजह है कि यहां के लोगों ने सदियों पुरानी लोक कलाओं को आज भी जिंदा रहा है। ऐपण कला, जिसका उपयोग कुमाऊं में प्रत्येक शुभ कार्य में पूरी धार्मिक आस्था के साथ किया जाता है।

ऐपण यानी अल्पना एक ऐसी लोक कला है, जिसका इस्तेमाल कुमाऊं में सदियों से जारी है। यहां ऐपण कलात्मक अभिव्यक्ति का भी प्रतीक है। इस लोक कला को अलग-अलग धार्मिक अवसरों के मुताबिक बनाया जाता है। शादी, जनेऊ, नामकरण और त्योहारों के मौकों पर हर घर इसी लोक कला से सजाया जाता है।

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देखने में भले ही ये आसान से नजर आते हों, लेकिन इन्हें बनाने में ग्रहों स्थिति और धार्मिक अनुष्ठानों का खास ध्यान रखा जाता है। हर ऐपण खुद में अलग है, धार्मिक अनुष्ठान और ग्रहों के स्थिति को देखते हुए इसे तैयार किया जाता है।

पुराने दौरे में ऐपण बनाने में जहां गोबर, चावल और गेरू को प्रयोग में लाया जाता था। वहीं आज इन्हें बनाने में पेंट और ब्रश का इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं त्योहारों के मौसम में अब बाजारों में रेडिमेड ऐपण भी मिलने लगे हैं, जो समय तो बचाते ही हैं और साथ ही सात समुंदर पार बैठे कुमाऊंनियों का घर भी सजाते हैं।

समय के साथ ऐपण कला में भले ही काफी बदलाव आया हो, लेकिन इसका जादू आज भी बरकरार है। ये पहाड़ की एक ऐसी कला है जो पीढ़ी दर पीढ़ी बिना प्रशिक्षण के ही चलती आ रही है। रेडिमेड ऐपण बेचने वालों का कहना है कि आज के दौरे में लोगों के पास समय नहीं है, इसलिए लोग रेडिमेड ऐपण खरीदते हैं।

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कुमाऊं से बाहर रहने वाले यहां के लोगों के लिए रेडिमेड ऐपण ज्यादा उपयोगी साबित हो रहे हैं। विदेशों में रहने वाले कुमाऊंनी लोग भी रेडिमेड ऐपण मंगवाते हैं। कुमाऊं की अन्य परंपराओं की तरह इस लोककला को भी जिंदा रखने में महिलाओं का अहम रोल रहा है।

यहां के लोग विदेशों में हों या फिर देश के किसी भी कोने में शुभ कार्यों में ऐपण वहां जरूर नजर आते हैं। ये कला कुमाऊं की पहचान तो है, साथ ही धरोहर भी है।