आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर यदि उत्तराखंड सरकार की तैयारियां पुख्ता होतीं और राहत व बचाव अभियान समय रहते चलाए जाते, तो जून 2013 की दैवीय आपदा में कई और जिंदगियां बचाई जा सकती थीं। जून 2013 की दैवीय आपदा के संबंध में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में इस हकीकत का खुलासा हुआ है।

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि न तो राज्य की विजय बहुगुणा सरकार को इस जलप्रलय से हुई भारी तबाही का समय रहते पता चल पाया और न राहत-बचाव के पर्याप्त उपकरण व कार्ययोजना राज्य सरकार के पास थी। मौसम विभाग की पूर्व चेतावनी को भी जिला आपदा प्रबंधन सहित अन्य सरकारी तंत्र ने गंभीरता से नहीं लिया।

सदन में पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि मौसम विभाग ने 15 व 16 जून को भारी बारिश की चेतावनी देते हुए यात्रियों को पहाड़ी क्षेत्रों में न जाने व सुरक्षित स्थानों पर लौट आने की सलाह दी थी। केदारनाथ, बद्रीनाथ व निकटवर्ती क्षेत्रों में भारी बारिश की चेतावनी के बावजूद रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन की ओर से एहतियाती कदम नहीं उठाए गए।

यही नहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि अतिवृष्टि से हुए नुकसान का राज्य सरकार को दो दिन तक अंदाजा भी नहीं था। 18 जून को जब एक दल ने आपदाग्रस्त क्षेत्र का हवाई दौरा किया, तब जाकर नुकसान का पता चला। तब तक पूरा संचार नेटवर्क ठप हो गया था।

चमोली, पिथौरागढ़ व उत्तरकाशी जिला प्रशासन ने राज्य सरकार से राहत व बचाव के लिए हेलीकॉप्टर की मांग की, मगर रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन की ओर से ऐसी कोई भी औपचारिक मांग नहीं की गई। चमोली को छोडकर बाकी जिलों में 19 जून को चॉपर उपलब्ध कराए गए। इससे बचाव अभियान में देरी हुई।