सुशील पंडित।…

30 जनवरी 1948। महात्मा गांधी अपनी सार्वजनिक सायं प्रार्थना सभा में जाने की तैयारी में थे। उसी सभा में जहां नाथूराम गोडसे घात लगाए उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। महात्मा गांधी अपनी होने वाली हत्या के षड़यंत्र से अनभिज्ञ, एक गंभीर मंत्रणा में व्यस्त थे। जीवन की इस अंतिम निजी बैठक में गांधी जी अपने अनुज-तुल्य और निष्ठावान अनुयायी सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ थे।

सरदार खीजे हुए थे। सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री होते हुए भी, कश्मीर के विषय में अपने मंत्रालय की अनदेखी से। प्रधानमंत्री नेहरू भी खिन्न थे, रजवाड़ों के भारत में विलय के विषय पर सरदार पटेल द्वारा उनकी अनदेखी पर। कुल मिलाकर सरदार ने सरकार छोड़ने का मन बना लिया था। वे पहुंचे थे बापू की अनुमति लेने। बापू ने उन्हें समझाया। कहा कि देश को नेहरू और सरदार दोनों चाहिए। और सरदार हमेशा की तरह बापू की बात सर-माथे लगाकर लौट आए। कुछ मिनटों बाद बापू हमसे छिन गए। और कुछ ही हफ्तों बाद सरदार को एक बड़ा दिल का दौरा पड़ा। जिसके बारे में उन्होंने अपने इलाज के दौरान कहा था कि यह बापू की हत्या का जमा होता अवसाद ही था जो कि दौरा बनकर फूट पड़ा था।

देश के सबसे पहले उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री, सरदार वल्लभभाई पटेल के विषय में देश को जितना जानना चाहिए उसका अंश मात्र भी मालूम नहीं है। नेता तो बहुत हुए। एक से बढ़कर एक लोकप्रिय। लेकिन राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए, अपना सब कुछ दांव पर लगाकर, कठिन से कठिन चुनौती में भी, कितना भी अप्रिय निर्णय ही क्यों न लेना पड़े, भारत के भविष्य को समर्पित, एक साधक की भांति रत, दूरदृष्टा, अपने कण-कण का उत्सर्ग करने को तत्पर – ऐसे थे हमारे सरदार।

राष्ट्रहित के लिए यदि उन्हें कुछ ताकतवर तत्वों को रुष्ट भी करना होता तो उन्हें इससे परहेज़ नहीं होता था। येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि, प्रशंसा और सस्ती वाहवाही जुटाने के लिए कुछ भी करने की व्यापक प्रवृति के बीच, भारत का अशुभ चाहने वालों की आंख की किरकरी बनकर भी यदि किसी ने इतिहास रचा, तो वे थे सरदार पटेल। उनका जीवन ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है।

कैबिनेट मिशन
ठीक उस समय जब भारत स्वतंत्रता की देहरी पर खड़ा था, सरदार की सूझबूझ और आग्रह भारत के काम आया। अवसर था कैबिनेट मिशन का। अंग्रेज़ों की मुस्लिम लीग से सांठगांठ कोई छुपी नहीं थी। कैबिनेट मिशन ने दो प्रस्ताव रखे। 16 मई 1946 के प्रस्ताव में स्वतंत्र भारत की, प्रदेशों के एक ढीले-ढाले संघ के रूप में कल्पना की गई थी। इसमें प्रदेश सांप्रदायिक बाहुल्य के आधार पर गठित होते और उन्हें वृहत् स्वायत्तता भी प्राप्त होती। ये प्रदेश सांप्रदायिक आधार पर अपना समूह भी बनाते।

दूसरा प्रस्ताव 16 जून 1946 का था। इसमें सांप्रदायिक आधार पर विभाजित दो प्रभुता संपन्न राष्ट्रों का निर्माण कर उन्हें एक महासंघ के रूप में साथ रखने की कल्पना थी। और इसमें 600 से अधिक रजवाडे अपने लिए विलय और स्वतंत्रता में से कुछ भी चुनते। जैसी की अपेक्षा थी, कांग्रेस ने इन दोनों प्रस्तावों का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग ने एक पैंतरे के तहत सकारात्मक दिखाने के लिए दोनों प्रस्तावों के लिए हामी भर दी थी। उन्हें मालूम था कि कांग्रेस के विरोध के चलते, कैबिनेट मिशन की असफलता का ठीकरा कांग्रेस के सर फूटेगा और इसका परोक्ष लाभ सीधे मुस्लिम लीग को मिलेगा। इस तरह अंग्रज़ों को भी मुस्लिम लीग के पक्ष में फैसला लेने का औचित्य मिलेगा।

सरदार इस साजिश को भांप गए। कांग्रेस के भीतर इन प्रस्तावों के प्रति घोर विरोध और क्रोध को सीधे झेलते हुए सरदार ने पार्टी कार्यसमिति को 16 मई वाले पहले प्रस्ताव के लिए तैयार करने का जोखिम उठाया। दूसरी ओर सरदार ने सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और लॉर्ड पैथिक लॉरेंस से यह अनौपचारिक आश्वासन भी ले लिया था कि सांप्रदायिक आधार पर प्रदेशों की समूह-रचना का क्रियान्वयन टाला जाएगा। सरदार पटेल ने नेहरू, राजेंद्र बाबू और राजगोपालाचार्य को इस प्रस्ताव के लिए राजी कर लिया।

कांग्रेस द्वारा 16 मई के प्रस्ताव को स्वीकार करते ही मुस्लिम लीग ने पैंतरा बदला। जिन्ना ने 16 मई वाले प्रस्ताव को दी गई अपनी मंजू़री वापिस ले ली। वायसराय लॉर्ड वेवल के पास कांग्रेस को केन्द्र में सरकार गठन करने का न्यौता देने के सिवाय कोई उपाय नहीं बना था। नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा अंतरिम सरकार गठित की गई। इस कांग्रेस सरकार का नेतृत्व नेहरू ने ही क्यों किया, इसकी भी एक रोचक कहानी है।

प्रधानमंत्री
1946 तक कांग्रेस के अध्यक्ष थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद। उनका कार्यकाल समाप्त हो चला था। पार्टी को नया अध्यक्ष चुनना था। यह सर्वविदित था कि जो भी कांग्रेस का अध्यक्ष बनता, उसी के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार गठित होती।

कांग्रेस की 15 प्रदेश समितियों ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए जो भी अनुमोदन भेजे उनमें सरदार पटेल को भारी बहुमत प्राप्त था। ऐसी स्थिति में नेहरू के पक्ष में अपना नाम वापस लेने के लिए महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को समझाया। बापू के आदेश को शिरोधार्य करते हुए सरदार पटेल ने नेहरू के लिए स्वतंत्र भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त किया।

विभाजन
सरदार पटेल की सूझबूझ के सामने पस्त होकर जिन्ना ने, आवेश में 16 अगस्त, 1946, को ‘सीधी कार्रवाई’ की चेतावनी दे डाली। किसी ने नहीं सोचा था कि मुस्लिम लीग भीषण दंगे कराकर नृशंस हत्याकांड़ों के माध्यम से पाकिस्तान की अपनी मांग मनवाना चाहती है। इस विभीषिका को रोकने की गृहमंत्री सरदार पटेल की कोशिशों को प्रादेशिक सरकारों के काम में हस्तक्षेप मानते हुए, अंग्रेज़ सरकार ने ‘असंवैधानिक’ ठहराकर विफल कर दिया। सरदार पटेल ने इतनी बड़ी संख्या में निर्दोषों के लगातार होते संहार को मूकदर्शक बनकर देखने से बेहतर विभाजन स्वीकार करने में ही समझदारी समझी।

भारत गठन
महात्मा गांधी ने तो साफ-साफ कहा था कि राज्यों और रजवाड़ों की समस्या को कोई सुलझा सकता है तो वह हैं सरदार पटेल। 15 अगस्त 1947 तक आते-आते 565 रजवाड़ों को भारत में विलय का राष्ट्रवादी औचित्य समझा देना एक भगीरथी प्रयास था। केवल जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद ही छूटे थे। सितम्बर 1948 तक जूनागढ़ और हैदराबाद भी भारत का अंग बन गए और हैदराबाद का निज़ाम जो ‘स्वतंत्रता, पाकिस्तान अथवा युद्ध’ पर अड़ा हुआ था, त्वरित ‘पुलिस कार्रवाई’ के बाद भारत सरकार से राज प्रमुख की भूमिका लेकर शांत हो गया।

कश्मीर
इस विषय में सरदार पटेल के नेहरू और महात्मा गांधी से मतभेद स्पष्ट थे। सरदार 1 जनवरी, 1949 को स्वघोषित एक तरफा युद्धविराम के पक्ष में नहीं थे। खासकर तब, जब भारत ने अपना भूभाग वापस हासिल भी नहीं किया था। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने का नेहरू का प्रस्ताव भी शामिल था।

सरदार पटेल द्वारा असहमति व्यक्त करने के बावजूद दोनों प्रस्तावों पर अमल किया गया। पाकिस्तान को उसके कश्मीर पर आक्रमण के चलते पचपन करोड़ की राशि न देने का सुझाव भी सरदार पटेल का ही था। गांधी ने आमरण अनशन पर जाकर इसे भी पलटा दिया। इन दोनों विषयों पर सरदार पटेल का आग्रह और मुखर विरोध कालांतर में सही साबित हुए। लेकिन भारत को एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

महत्वपूर्ण निर्णय
यद्यपि सरदार पटेल के नेहरू के साथ कई विषयों पर मतभेद थे, सरदार ने उन्हें सरकार के सुचारू रूप से चलने में बाधा या नेहरू के नेतृत्व को किसी प्रकार की चुनौती नहीं बनने दिया। सरदार सैन्य कार्रवाई द्वारा गोआ की मुक्ति चाहते थे। सरदार चीनी अतिक्रमण पर तिब्बत को सैनिक सहायता भी भेजना चाहते थे। नेहरू दोनों विषयों पर राज़ी नहीं हुए। लेकिन ऐसा भी नहीं कि पटेल कुछ भी होने देते। जब नेहरू राजेंद्र बाबू की जगह राजगोपालाचार्य को पहला राष्ट्रपति बनाने पर अड़े तो सरदार पटेल ने पार्टी संगठन पर अपनी मज़बूत पकड़ का परिचय देते हुए ऐसा नहीं होने दिया।

इसी तरह, जब नेहरू के विरोध के विपरीत राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए और नेहरू के समर्थित प्रत्याशी जीवतराम कृपालानी हार गए तो इसका श्रेय भी सरदार पटेल को गया। लेकिन इस बात से खिन्न होकर, ‘पार्टी के अविश्वास’ के चलते जब नेहरू ने त्यागपत्र का आग्रह किया तो उन्हें बने रहने के लिए मना लेने का श्रेय भी सरदार पटेल को ही दिया गया।

जीवन पर्यन्त क्षुद्र स्वाथों से ऊपर उठकर, अपने परिवार और सगे-संबंधियों का मोह त्यागकर, वंशवादी राजनीति की परिपाटी से अलग रहने का उदाहरण बनकर उन्होंने राजनीति को श्रेयस्कर परंपराएं दीं। कालांतर में यदि उनका अनुसरण होता, या सरदार की दीर्घ आयु का आशीर्वाद ही भारत को मिल जाता तो क्या होता, यह कल्पना मात्र ही रोमांच पैदा करती है। ऐसे थे हमारे सरदार वल्लभभाई पटेल।

(सुशील पंडित वरिष्ठ पत्रकार हैं। उक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं)