करीब ढाई साल के इंतजार के बाद आखिरकार भारत और पड़ोसी देश नेपाल को जोड़ने वाला जौलजीवी पुल बनकर तैयार हो गया है। 2013 में आई आपदा में जौलजीवी पुल जमीदोंज हो गया था।

पुल गिरने के कारण पिथौरागढ़ जिले के इस इलाके के लोगों को तो खासी परेशानियों का सामना करना ही पड़ रहा था, साथ ही सीमांत का व्यापार भी बुरी तरह प्रभावित हो गया था। कहा जा सकता है अब ढाई साल बाद लोगों के चेहरों पर फिर रौनक लौट आई है।

ढाई साल के इंतजार के बाद जौलजीवी के सीमांत इलाके में जिंदगी फिर पटरी पर लौटेगी। नेपाल सरकार ने 180 मीटर लम्बे जौलजीवी पुल को बनाने में सफलता हासिल कर ली है।

दुर्गम भौगोलिक हालात को मात देकर नेपाली इंजीनियरों ने बेहतरीन तकनीक का नमुना इस पुल के जरिए पेश किया है। पुल के बनने से दोनों मुल्कों के सीमांत में हालात तो बहाल हो ही रहे हैं साथ ही हजारों व्यापारियों को पुराने दिन वापस लौटने की भी उम्मीद जगी है।

स्थानीय व्यापारियों का का कहना है कि ढाई साल से उनका व्यापार चौपट था, अब पुल बनने से उन्हें भरोसा है कि पुराने दिन लौटेंगे। आपदा के बाद कहने को तो यहां दो कच्चे पुलों का निर्माण हुआ था, लेकिन प्रकृति के गुस्से के आगे इन पुलों का वजूद नहीं टिक पाया।

तब से लोग कभी ट्राली तो कभी तार से आर-पार जाने को मजबूर थे। इस खतरनाक सफर में कइयों की जिंदगी भी तार-तार हुई। वैसे तो जौलजीवी के पुल को बनने में मात्र तीन महीने का वक्त लगा, लेकिन विदेश मंत्रालय की कार्यवाही ने दो साल से ज्यादा का वक्त कागजी औपचारिकताओं लगा डाला।

नेपाली इंजीनियर नरेन्द्र माहरा का कहना है कि पुल बनने में मात्र तीन महीने का समय लगा है। नेपाल के इंजीनियरों ने बेहतरीन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पुल बनाया है। पुल की ऊंचाई इतनी अधिक है कि काली नदी का प्रवाह अब इसे छू भी नहीं सकता।

पहा़ड़ी इलाकों में पुल लोगों की जिंदगी को भी जोड़ते हैं। जौलजीवी का पुल इस मायने में और अधिक अहम है कि इसके जरिए भारत-नेपाल में रोटी-बेटी के रिश्ते भी कायम होते हैं।