उत्तराखंड की उत्तरी और पूर्वी सीमा चीन व नेपाल से लगी हुई है। खास तौर पर उत्तरी सीमा सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां बॉर्डर पर भारत और तिब्बत (चीन) को जोड़ने वाले एक मात्र टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर बना चल्थी पुल पिछले 60 साल से लगातार अपनी सेवा दे रहा है।

1955 में बना चल्थी पुल पहाड़ के लोगों की लाइफ लाइन भी साबित हुआ है। बता दें कि चीन ने भारत से लगे तिब्बत के सीमांत इलाकों में रेल और सड़क लाइन का जाल बिछा दिया है। पिछले 60 सालों में सिंगल लाइन यह पुल सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा खतरा बना हुआ है।

उत्तराखंड की सीमा से जहां हिमालयी देश नेपाल जुडा हुआ है। वहीं टनकपुर-पिथौरागढ़-तवाघाट राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़क सीधा तिब्बत बॉर्डर से जुडी है। उत्तराखंड से लगी सीमा पर जिस तरह चीन ने तेजी से काम किया है, उस तरह से भारत में काम नहीं हुआ। टनकपुर-पिथौरागढ़ के मार्ग पर 1955 में बना चल्थी पुल देश के सुरक्षा तंत्र को बड़े खतरे का आईना दिखाता नजर आ रहा है।

पूर्व सैनिक भी मानते हैं कि अगर पड़ोसी देश चीन के साथ युद्ध होता है तो जर्जर हो चुका 165 मीटर का चल्थी पुल सुरक्षा के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है। उधर जिला प्रशासन का कहना है कि चल्थी पुल के बगल में बीआरओ एक नया पुल बना रहा रही थी, लेकिन ठेकेदार से कोई विवाद के बाद पिछले 10 साल से नए पुल का काम रुका हुआ है।

जबकि एनएच अधिकारी अपना अलग रोना रो रहे हैं। उनका कहना है कि चल्थी पुल ने अभी अपनी आधी उम्र ही पूरी की है और नए निर्मणाधीन पुल को बीआरओ ने अभी एनएच विभाग को स्तान्तरित ही नहीं किया है।

राष्ट्रीय राजमार्ग पर बना सिर्फ चल्थी पुल ही नहीं कई बड़े और छोटे पुल भी हैं जो देश की सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा बने हुए हैं। स्थिती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बेहद महत्वपूर्ण पुल को लेकर जिला प्रशासन, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, बीआरओ और ठेकेदार किस तरह गंभीर है, जो देश की सुरक्षा के साथ ही बड़ी लापरवाही को अंजाम दे रहे हैं और देश की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।