अफगानिस्तान में हिंदूकुश के पहाड़ों में इंडियन व यूरेशियन प्लेट की लगातार टकराहट से संचित ऊर्जा बड़े भूकंप के रूप में बाहर आ चुकी है। कुछ ऐसी ही भूगर्भीय हलचल समूचे उत्तर भारत में भी चल रही है। बावजूद इसके कई ऐसे स्थान हैं, जहां लंबे समय से यह ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाई।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक करीब 2000 किलोमीटर लंबे हिमालयी क्षेत्र में ऐसे 20 स्थान हो सकते हैं और भारत में आधा दर्जन के करीब।

वाडिया संस्थान के भूवैज्ञानिक डॉ. आरजे पेरूमल के अनुसार उत्तराखंड के रामनगर, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा व असम क्षेत्र में कभी भी बड़े भूकंप आ सकते हैं। इसकी वजह है कि यहां धरती के नीचे चल रहे तनाव के बावजूद ऊर्जा का बाहर न निकल पाना।

डॉ. पेरूमल के अनुसार रामगनर क्षेत्र में साल 1255 में आठ से नौ रिक्टर स्केल का भूकंप आया था, इसके बाद यहां बड़ा भूकंप रिकॉर्ड नहीं किया गया, जबकि इसी तरह की भूगर्भीय संरचना वाले नेपाल में साल 1255 के बेहद शक्तिशाली भूकंप (8.0 से 9.0 रिक्टर स्केल) के बाद साल 1831, 1934 और कुछ समय पहले 2015 में भारी भूकंप आ चुका है।

एक ही माइक्रो सेस्मेसिटी बेल्ट में पड़ने वाले हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में भी साल 1905 के भूकंप (7.8 रिक्टर स्केल) के बाद कोई बड़ी हलचल नहीं हुई। वहीं, सेंट्रल नेपाल व देश का असोम प्रांत भी एक बेल्ट में आता है। यहां कम अंतराल में छोटे भूकंप के साथ ही बड़े भूकंप भी आते हैं।

नेपाल में 1255 के ऐतिहासिक भूकंप को छोड़कर पिछले तीन बड़े भूकंप का अंतराल 51 से 81 साल के बीच रहा और इसी रूट के असम में पिछले दो बड़े भूकंप 51 से 81 साल के बीच में आए। इस संयोग को एक जैसे भूगर्भीय तनाव झेलने वाली जमीन से जोड़कर देखा जाए तो अब बारी असोम की भी हो सकती है।

इस तरह मिल रहे बड़े भूकंप के संकेत
1 नेपाल के भूकंप
पहला: 1255 (8.0 से 9.0)
दूसरा: 1883 (7.6)
तीसरा: 1934 (8.1)
चौथा: 2015 (7.9)

2 रामनगर (उत्तराखंड)
पहला: 1255 (8.0 से 9.0)
नोट: इसके बाद बड़ी हलचल नहीं

3 कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
पहला: 1905 (7.8)

4 असम
पहला: 1883 (7.6)
दूसरा: 1950 (8.1)