भारतीय भूवैज्ञानिक संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक खास तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के जरिए किसी भी इलाके में भूस्खलन कब सक्रिय हो सकता है इस बात का पता लगाया जा सकता है। यही नहीं नीलगिरी क्षेत्र में इसका सफल प्रयोग भी कर लिया गया है। महज पांच लाख रुपये में भूस्खलन का पता लगाया जा सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मात्र कुछ सटीक आंकड़ों और जानकारी के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि कितनी बरसात होने पर भूस्खलन सक्रिय हो सकता है। भूस्खलन उत्तराखंड के लिए भी एक बड़ी प्राकृतिक आपदा की तरह ही है।

मुसीबत यह है कि भूस्खलन से जुड़ी हुई कोई पूर्व चेतावनी का तंत्र नहीं है। ऐसे में भूस्खलन की चपेट में आकर हताहत होने वालों की संख्या में लगातार इजाफा ही हो रहा है। साल 2010 में बागेश्वर जिले के सुमगढ़ में अचानक हुए भूस्खलन के कारण 18 छात्रों की जान चली गई थी। इसी तरह कैलाश-मानसरोवर यात्री दल के कई यात्रियों को भूस्खलन के कारण जान गंवानी पड़ी थी।

वैज्ञानिक अब इस आपदा की पूर्व चेतावनी का तंत्र विकसित करने का दावा कर रहे हैं। एक कार्यशाला में भाग लेने अस्थायी राजधानी देहरादून पहुंचे भारतीय भूवैज्ञानिक संस्थान के डॉ. पंकज जायसवाल का कहना है कि कुछ सटीक आंकड़ों और अलार्म सिस्टम के जरिए यह संभव है। पूरे निगरानी तंत्र को स्थापित करने में महज पांच लाख रुपये तक का खर्च है। डॉ. पंकज ने राज्य आपदा न्यूनिकरण और प्रबंधन केंद्र में भूस्खलन पर आयोजित कार्यशाला में इस तकनीक का खाका भी पेश किया।

आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने भी इसमें रुचि दिखाई है। एक अधिकारी के मुताबिक राज्य में यह तकनीक कितनी कारगर होगी इसका टेस्ट होने के बाद ही तस्वीर साफ हो पाएगी। उत्तराखंड में करीब 460 चिन्हित भूस्खलन क्षेत्र हैं और चार धाम यात्रा में भूस्खलन के कारण बार-बार व्यवधान का सामना सरकार को करना पड़ता है।

डॉ. पंकज के मुताबिक बीआरओ इस बात का पूरा रिकॉर्ड रखता है कि कब कहां से मलबा हटाया गया। इस रिकॉर्ड को बरसात के आंकड़ों के साथ मिलाने पर थ्रेशोल्ड लिमिट को निकाला जा सकता है।