हिमालय में चलने वाली मछली (वॉकिंग स्नेकहेड फिश) सहित 200 से ज्यादा नई प्रजातियां पाई गईं हैं। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फेडरेशन की ओर से इस महीने एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया पूर्वी हिमालय में ऐसी मछली की प्रजाति है जो कि हवा में सांस लेने के साथ-साथ एक समय में चार दिन तक जमीन पर रह सकती है।

2009 के बाद से हर साल औसतन 34 नई प्रजातियां पूर्वी हिमालय के भूटान, पूर्वोत्तर भारत, नेपाल, उत्तरी म्यांमार और दक्षिणी तिब्बत क्षेत्र में पाई गई हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फेडरेशन) की रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी हिमालय में इंसानी बसावट के चलते ये प्रजातियां अपना अस्तित्व खो रही हैं।

लुप्त हो रही इन प्रजातियों पर बयान देते हुए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सामी टोर्निस्की ने कहा है कि इन खोती प्रजातियों को बचाना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। हाल के सालों में मछली की कुल 26 प्रजातियां पाई गई हैं। जिनमें से जमीन पर चलने वाली मछली सबसे अनोखी है। यह मछली लगभग 4 फुट लंबी हो सकती है। एक समय में मादा मछली 15,000 अंडे देती है।

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इस मछली के अलावा एक ऐसा बंदर भी पाया गया है जो अन्य बंदरों से बिल्कुल अलग है। इस बंदर की नाक इसे अन्य बंदरों से अलग करती है। इस बंदर की नाक उल्टी है। यानी नीचे की तरफ जाने की बजाय इस बंदर की नाक ऊपर की ओर विकसित होती है। यह बंदर ज्यादातर बरसात के दिनों में देखा जा सकता है।

हिमालय में ऐसी प्रजातियां मिल रही हैं तो हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड में भी ऐसी कई प्रजातियां हो सकती हैं, जिनके बारे में अभी तक दुनिया को पता नहीं है।