सांकेतिक तस्वीर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ‘डिजिटल इंडिया अभियान’ के जरिए देश में डिजिटल क्रांति लाने की बात कर रहे हैं। गांव-गांव को इंटरनेट से जोड़ने की बात हो रही है। लेकिन अब भी उत्तराखंड में कई गांव ऐसे हैं जो आदिम युग में जी रहै हैं। यहां अब तक बिजली नहीं पहुंच पाई है और अब भी ग्रामीण मिट्टी के तेल के दीए के भरोसे ही हैं।

उत्तरकाशी जिले के मोरी क्षेत्र के 42 से ज्यादा गावों में आज भी बिजली नहीं पहुंच पाई है। यहां लघु जल विधुत परियोजनाएं बनाकर गावों को रोशन करने का काम शुरू हुआ, लेकिन यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। ये परियोजनाएं आज तक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। नतीजा परियोजनाएं तो बनी नहीं, करोडों रुपये डकार लिए गए।

मोरी तहसील के 42 गांव आज भी बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी दूर हैं। यहां लोग आज भी मशाल जलाकर रोशनी करते हैं। इस क्षेत्र के लिए सालों पहले तीन परियोजनाएं चिलूरगाड, खापूगाड और स्तरगाड परियोजनाएं तैयार करने की पहल की गई थी लेकिन, अधिकारियों के निक्कमेपन के चलते ये परियोजनाएं आज तक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं।

uttarkashi_village

सौ किलोवाट क्षमता की चिलूरगाड परियोजना से ओसला, पंवाडी, गंगाड, धारकोट आदि गांवों को रोशन किया जाना था। साल 2008 में एक करोड, 52 लाख की लागत से शुरू हुई इस परियोजना को 2009 में बनकर तैयार होना था लेकिन, परियोजना सात साल बाद भी कागजों पर ही है।

उल्टे परियोजना पर अब तक एक करोड़ो रुपये खर्च हो चुका है। दैनिक अखबार अमर उजाला ने इस मामले की पड़ताल की है और इस पड़ताल में इस परियोजना में भारी घोटाले सामने आए हैं। दस लाख की एमबी पर ग्रामीणों की समिति के खाते में तीस लाख डाल दिए गए, जिसका कोई भी हिसाब न तो उरेडा के पास है और न ग्रामीणों के पास।

यही नहीं रुड़की की एक फर्म को पार्ट्स उपलब्ध कराने के नाम पर 70 फीसदी भुगतान कर दिया गया, लेकिन सामान का आज तक अता-पता नहीं है। विभाग अब उक्त फर्म को 14 लाख 81 हजार के वसूली नोटिस भेजकर औपचारिकताएं पूरी कर रहा है।

यही नहीं मोरी के ढाटमीर गांव के लिए 65 लाख की लागत से स्वीकृत हुई 40 किलोवाट की खापूगाड परियोजना में भी यही कहानी दोहराई गई। 27 लाख रुपये पानी में बहाने के बावजूद परियोजना सात साल बाद भी अस्तित्व में नहीं आ पाई है। कार्यदायी कंपनी को भी नियमों के खिलाफ 70 प्रतिशत भुगतान कर दिया गया। अब कंपनी का कोई पता ही नहीं है।