भांग को नशे रूप में ही जाना जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में भांग के दानों की चटनी खासी मशहूर है। लेकिन अब इसी भांग से उत्तराखंड सरकार गांवों की किस्मत बदलने की कोशिश में जुट गई है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पहाड़ों में किसानों को भांग की खेती का लाइसेंस देने के निर्देश दिए हैं। राज्य में तराई और भाबर के इलाके में भांग की खेती प्रतिबंधित है पर वर्तमान नियमों के तहत पर्वतीय जिलों में किसानों से भांग की खेती कराई जा सकती है। शर्त यही है कि इस उत्पाद को केवल सरकार ही खरीदेगी।

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पहाड़ में भांग की चटनी एक ऐसी रेसिपी है जो किसी भी बेहतर रेसीपी बुक में जगह पा जाती है। ठंडे इलाकों में भांग का उपयोग दवा के रूप में भी किया जाता रहा है। भांग का अधिक प्रचलन नशे के रूप में ही होता रहा है, लिहाजा भांग की खेती पर अघोषित प्रतिबंध राज्य में अब तक रहा है।

आबकारी अधिनियम में भांग की खेती तराई और भाबर में प्रतिबंधित है पर पर्वतीय जिलों में भांग की खेती का लाइसेंस दिया जा सकता है। भांग अब अपने मजबूत रेशे के कारण पहचान बना रहा है। विश्व बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। अभी तक इस पर चीन का कब्जा है।

आय का बढ़िया जरिया होने के बावजूद भी राज्य में इसकी खेती की लगातार अनदेखी की जाती रही। शनिवार को बीजापुर में मुख्य सचिव राकेश शर्मा सहित अन्य अधिकारियों की बैठक में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मानकों के अनुरूप भांग के बीज विकसित करने और भांग की खेती की कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए।

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मुख्यमंत्री का कहना है कि इस खेती को जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते। इसी तरह बिच्छु घास (कंडाली) के रेशे का भी औद्योगिक उपयोग हो रहा है। मानकों के अनुसार उसी भांग का औद्योगिक उपयोग किया जा सकता है, जिसमें टीएचसी (टेट्रा हाइड्रो केनाबिनोल) तत्व 0.3 से 1.5 प्रतिशत तक हो। इससे ज्यादा होने पर एक्ट के अनुसार भांग का निजी क्षेत्र में औद्योगिक उपयोग नहीं किया जा सकता है।

आबकारी आयुक्त विनयशंकर पांडे के अनुसार हमारे यहां भांग में टीएचसी तत्व चार से पांच प्रतिशत तक है। एनडीपीएस एक्ट के अनुसार तराई व भाबर क्षेत्रों को छोड़कर राज्य के अन्य क्षेत्रों में किसानों को भांग उत्पादित करने के लिए लाइसेंस दिए जा सकते हैं, लेकिन उत्पादन को केवल सरकार ही खरीद सकती है।

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मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं कि पंतनगर विश्वविद्यालय, विवेकानंद अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा और भरसार विवि शोध कर भांग के ऐसे बीज विकसित करें, जिनमें टीएचसी मानकों के अनुरूप ही हो। बायो फाइबर के रूप में प्रयोग किए जाने वाले भांग के रेशे की काफी मांग है। इससे गांवों की आर्थिकी में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

एक्ट के अनुसार ही किसानों को लाईसेंस दिए जाएं। उत्पादित भांग के रेशे खरीदने की व्यवस्था बांस और रेशा बोर्ड करे। यह व्यवस्था भी पुख्ता की जाए कि नशे के लिए इनका उपयोग न हो पाए। भीमल, बिच्छु घास के रेशे के उपयोग को भी बढ़ाया जाए।