शरद नवरात्र शुरू होने वाले हैं। नवरात्र यानी मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना। नवरात्र में हम मां दुर्गा के नौ रूपों की ही आराधना नहीं करते, बल्कि नारी शक्ति के उन विभिन्‍न रूपों को नमन करते हैं, जो सृष्टि के आदि समय से इस संसार का संचालन कर रहे हैं।
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सिंह पर सवार मां दुर्गा अपनी अष्‍ट भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, धनुष, तलवार, त्रिशुल और कमल धारण किए हुए भक्‍तों को भयमुक्‍त करती हुई और दुष्‍टों का दमन करती हुई नजर आती हैं। मां दुर्गा के इस रूप में दया, क्षमा, शांति, कांति, श्रद्धा, भक्ति, ममता, सहनशीलता, करुणा और अन्‍नपूर्णा भी दिखायी देती हैं। यही सारे गुण भारतीय नारी के भी आभूषण हैं।

यही वजह है कि भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति कहकर संबोधित किया गया है। यह सच भी है कि नारी शक्ति है, सबला है, अबला नहीं। शास्‍त्रों में कहीं भी नारी को अबला के रूप में प्रस्‍तुत नहीं किया गया है। केवल धर्म ग्रंथ ही नहीं, झांसी की रानी, देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, पूर्व राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल, आईपीएस अधिकारी किरण बेदी या हाल ही में अंतरिक्ष यात्रा करने वाली सुनीता विलियम्‍स नारी के इसी शक्ति रूप की प्रतीक हैं।

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नवरात्र नारी के इसी शक्ति रूप को नमन करने का पर्व है। वास्‍तुशास्‍त्र में भी नवरात्र पूजा की महिमा का वर्णन किया गया है। अगर नवरात्र पूजा विधिवत की जाए तो वास्‍तु के कई दोषों की शांति होती है। वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार माता दुर्गा के नौ रूप नौ ग्रहों से संबंध रखते हैं। आशय यह कि प्रत्‍येक ग्रह माता के किसी न किसी रूप का प्रतिनिधि ग्रह है और प्रत्‍येक ग्रह का संबंध किसी दिशा विशेष से है। यह विदित ही है कि वास्‍तुशास्‍त्र दिशाओं के ज्ञान और उनके शुभ-अशुभ प्रभावों पर विस्‍तृत व्‍याख्‍या करता है।

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उल्‍लेखनीय है कि नवदुर्गा के इन रूपों की विधिवत आराधना न सिर्फ माता के उस रूप के प्रतिनिधि ग्रह की शांति करती है बल्कि आपके घर में अगर उस ग्रह से संबंधित दिशा में कोई वास्‍तु दोष है तो इस आराधना से उस दोष की भी काफी हद तक शांति होती है।

आइए, जानते हैं नवदुर्गा के नौ रूपों और उनसे संबंधित ग्रह एवं दिशाओं को।

नवरात्र माता का रूप ग्रह दिशा
प्रथम नवरात्र माता शैलपुत्री सूर्य पूर्व
द्वितीय नवरात्र माता ब्रह्नचारिणी राहु दक्षिण-पश्चिम
तृतीय नवरात्र चंद्रघंटा केतु माता चंद्रघंटा की आराधना सम्‍पूर्ण परिसर
को सकारात्‍मक ऊर्जा से भर देती है।
चतुर्थ नवरात्र कुशमांडा चन्‍द्र उत्‍तर-पश्चिम
पंचम नवरात्र स्‍कंधमाता मंगल दक्षिण
छटा नवरात्र कात्‍यायिनी बुध उत्‍तर
सप्‍तम नवरात्र कालरात्रि शनि पश्चिम
अष्‍टम नवरात्र महागौरी बृह‍स्‍पति उत्‍तर-पूर्व
नवम नवरात्र सिद्धि दात्रि शुक्र दक्षिण-पूर्व

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वास्‍तुशास्‍त्र में ईशान यानी उत्‍तर-पूर्व को पूजा स्‍थल के लिए सर्वात्‍तम स्‍थान बताया गया है। आप बेशक इस दिशा में पूजा स्‍थल या नवरात्र के लिए कलश स्‍थापना कर सकते हैं। लेकिन पूजा के उत्‍तम फल और वास्‍तुशांति के लिए (जैसा कि हमने ऊपर तालिका में वर्णित किया है) देवी-देवता से संबंधित दिशा में ही पूजा या कर्मकांड किया जाए तो वह पूजा अधिक फलदायी होती है।

हालांकि वास्‍तु के अनुसार पूजा स्‍थल पर मूर्ति के बजाए अपने ईष्‍ट की तस्‍वीर रखने का परामर्श दिया जाता है, लेकिन नवरात्र की तरह विशेष अवसर पर मूर्ति स्‍थापना की जा सकती है। जिस प्रकार हम दीवाली पर लक्ष्‍मी-गणेश की मूर्ति की स्‍थापना करते हैं, उसी प्रकार नवरात्र में भी मां दुर्गा की मूर्ति स्‍थापना की जा सकती है, लेकिन मूर्ति सवा पांच इंच से बड़ी न हो।

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ऐसे भी बहुत से लोग होते हैं, जो घर में पूजा स्‍थल नहीं बनाते या नहीं बना पाते, ऐसे लोग भी अगर नवरात्र के नौ दिनों में ईशान में पूजा स्‍थल बनाकर माता दुर्गा के नौ रूपों की आराधना क‍रते हैं, तो उनका पूजन फलदायी होता है।
बहुत से नि:संतान दंपती माता वैष्‍णो देवी यात्रा संतान प्राप्ति की आशा से जाते हैं, तो कुछ घर की सुख-शांति और समृद्धि के लिए यात्रा करते हैं। किंतु आप अगर किसी कारणवश अपनी इन कामनाओं की पूर्ति के लिएयात्रा नहीं कर पा रहे हैं, naresh_singal325तो नवरात्र पर की गई विधिवत पूजा भी आपको ऐसी यात्रा का फल प्रदान कर सकती है।

यह लेख मशहूर ज्योतिष, वास्तु और फेंग्शुई विशेषज्ञ नरेश सिंगल से बातचीत के आधार पर लिखा गया है। वास्तु से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या के समाधान के लिए नरेश सिंगल से संपर्क करें…

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