उतराखंड में महानिदेशक शिक्षा सेन्थिल पाण्डियन के सख्त रुख के बाद भी लापरवाह अधिकारी और शिक्षकों पर कोई असर होता दिख नहीं रहा है। पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षक हों या शिक्षा विभाग के अधिकारी ‘अपनी डपली अपना राग’ अलाप रहे हैं। अधिकारियों और शिक्षकों की लापरवाही का खामियाजा क्षेत्र के स्कूली बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

सीमांत उत्तरकाशी के पुरोला तहसील का सुदूरवर्ती सरबडियार क्षेत्र व्यवस्थागत खामियों की पोल खोल रहा है। करीब 17 किलोमीटर की पैदल दूरी वाले सरबडियार का ढिंगारी गांव में प्राथमिक विद्यालय और जूनियर हाईस्कूल हैं। लेकिन 19 छात्र-छात्राओं वाले जूनियर हाईस्कूल में एक भी टीचर नहीं है।

इसी हाईस्कूल के पास एक 42 छात्र संख्या वाला प्राथमिक विद्यालय भी है, जहां मात्र एक शिक्षक टीचर तैनात है। एक शिक्षक दोनों विद्यालय संचालित करता है। इसी क्षेत्र में सर गांव भी मौजूद है। यहां भी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल हैं और शिक्षकों की संख्या है पांच, आप स्कूल में जाएंगे, तो यहां आपको एक या दो टीचर ही मिलेंगे। दरअसल, तमाम कायदे कानूनों को ताक पर रखकर यहां टीचरों की शिफ्ट लगी हुई है।

ताज्जुब यह भी कि महकमे के अधिकारियों को भी स्कूलों के बारे में जानकारी नहीं है। जिला शिक्षा अधिकारी धर्म सिंह रावत इस पूरे मामले से अनजान हैं। रजिस्टर देखकर उन्हें पहली बार पता लगता है कि वास्तव में जूनियर हाईस्कूल ढिंगारी बिना टीचर के ही चल रहा है।

डिजिटल इंडिया और स्वच्छ भारत मिशन के नारों के बीच सुदूरवर्ती सरबडियार के दर्जनभर गांव आज भी देश-दुनिया से अनजान हैं। यहां आज तक न बिजली पहुंच पाई है, न पेयजल लाइनें हैं। ग्रामीण पेयजल के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं।

स्वास्थ्य सुविधाएं भी शिक्षा व्यवस्था की तरह चौपट हैं। पूरे क्षेत्र में एक भी शौचालय नहीं है। क्षेत्र में काम कर रही प्राइवेट कंपनी सतलुज जरूर यहां कुछ स्कूलों में शौचालय बनाने का काम कर रही है। देश-दुनिया से कटे इन क्षेत्रों में शायद ही कभी कोई अधिकारी पहुंचता हो।