देहरादून।… पहाड़ी इलाकों के विकास और यहां से तेजी से हो रहे पलायन पर रोक लगाने का सपना लेकर उत्तराखंड आंदोलन चलाया गया। आखिरकार उत्तराखंड को एक अलग राज्य के रूप में पहचान भी मिल गई लेकिन ना तो पहाड़ी इलाकों का सही से विकास हो पाया और ना ही पलायन पर रोक लगी। उल्टा राज्य बनने के बाद पलायन और तेज हो गया।

सरकारी आंकड़ों के हवाले से बीबीसी की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो जितना पलायन आजादी के बाद से उत्तराखंड बनने तक नहीं हुआ था, उससे कहीं ज्यादा राज्य गठन के बाद पिछले डेढ़ दशक में हो चुका है। साल 2000 से अब तक तीन हजार गांव खाली हो चुके हैं। रिपोर्ट बयां करती है कि उत्तराखंड में पलायन किस कदर भयावह स्थिति में पहुंच गया है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में ढाई लाख से ज्यादा घरों पर ताले लटके हैं। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में रहने वाली रौनक कहीं गुम हो चली है। गांव वीरान हो रहे हैं तो खेत-खलिहान बंजर में तब्दील हो गए हैं। बावजूद इसके गांव अब तक की सरकारों के एजेंडे का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। यदि बनते तो शायद आज ऐसी तस्वीर नहीं होती।

अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के गांवों का खाली होना सामरिक दृष्टि से किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता। सरकारें भी इस तथ्य से वाकिफ हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने अब तक कोई ठोस पहल नहीं की।

उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में पलायन का स्याह पहलू अर्थ एवं संख्या निदेशालय की सांख्यिकीय डायरी 2013 में भी सामने आया है। इसके मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में दो लाख 57 हजार 825 घरों पर ताले लटके हैं। ये वे घर हैं, जिनके बाशिंदों को सुविधाओं के अभाव में अपनी जड़ों से दूर होना पड़ा।

सबसे ज्यादा 36 हजार 401 घर अल्मोड़ा जिले में खाली हैं। इसके बाद पौड़ी और टिहरी जिलों में खेती योग्य भूमि भी बंजर में तब्दील हुई है।