ऋषिकेश।… बुधवार की देर रात ब्रह्मलीन हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आध्यात्मिक गुरु स्वामी दयानंद गिरि को शुक्रवार को ऋषिकेश में उन्हीं के द्वारा स्थापित दयानंद आश्रम में गंगा तट पर भू-समाधि दे दी गई।

आश्रम के न्यासियों, संत समाज और अनुयायियों की उपस्थिति में स्वामी दयानन्द को सुबह करीब दस बजे शीशमझाडी स्थित आश्रम परिसर में भू-समाधि दे दी गई। वेदों और उपनिषदों के प्रकांड विद्वान के रूप में विख्यात संत की पार्थिव देह को वैदिक मन्त्रोच्चार के बीच पवित्र अभिषेक प्रक्रिया पूरी करने के बाद भू-समाधि दी गई।

इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल, साध्वी प्राची, बीजेपी महासचिव राम माधव, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर संघ चालक दत्तात्रेय होसबोले, ऋषिकेश से बीजेपी विधायक प्रेम चंद्र अग्रवाल सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। दत्तात्रेय होसबोले अपने साथ संघ प्रमुख का शोक सन्देश पत्र भी लाए थे।

इससे पहले, स्वामी दयानन्द की पार्थिव देह को कुर्सी पर रख आश्रम प्रांगण में भू-समाधि स्थल के पास अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जिसके बाद ट्रस्टी स्वामी शांतात्मानन्द सहित साधु और गृहस्थ समाज के उनके अनुयायियों ने उन पर पुष्प, चादर चढ़ाने की रस्म मन्त्रोच्चार के बीच पूरी की। दस बजे स्वामी दयानन्द की देह भू-समाधि के लिए परिसर में खोदे गए गड्ढे में उतार दी गई, जिसके बाद शैव सन्त परम्परा के अनुसार पवित्र सामग्री उनके चारों ओर भरकर भू समाधि की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया।

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स्वामी दयानंद के निधन की खबर फैलने के बाद से ही उनके अंतिम दर्शनों के लिए उनके अनुयायियों और गणमान्य व्यक्तियों का तांता लग गया, जिनमें उत्तराखंड के राज्यपाल कृष्णकांत पॉल और मुख्यमंत्री हरीश रावत भी शामिल थे। गुर्दों के काम न करने के कारण पिछले काफी समय से अस्वस्थ चल रहे 87 वर्षीय स्वामी दयानंद का 23 सितंबर की देर रात निधन हो गया था।

इससे पहले, 23 सितंबर को दिन में स्वामी दयानंद की सेहत में लगातार आ रही गिरावट के बीच उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप उन्हें जौलीग्रांट स्थित निजी हिमालयन अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) से आश्रम लाया गया था। गत 11 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी स्वयं दयानंद आश्रम पहुंचे थे और उनसे मिलकर उनके स्वास्थ्य का हाल जाना था।

15 अगस्त 1930 को तमिलनाडु के कुंभकोड़म में स्वामी दयानंद गिरि का जन्म हुआ था। बचपन से ही धार्मिक स्वभाव के स्वामी दयानंद सरस्वती ने 31 साल की आयु में चिन्मय मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती से 1961 में चेन्नई में संन्यास दीक्षा ली थी।

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आदि जगद्गुरु शंकराचार्य संन्यास परंपरा से उन्हें दीक्षित किया गया था। वो दशनाम श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा से जुड़े हुए थे। उन्होंने ऋषिकेश मुनि की रेती शीशम झाड़ी में गंगा के तट पर दयानंद आश्रम की स्थापना सन 1964 में की थी। इस आश्रम की स्थापना से पूर्व वो स्वामी तारानंदगिरी के ऋषिकेश स्थित कैलाश आश्रम में भी रहे।

कैलाश आश्रम में उन्होंने स्वामी तारानंदगिरी और गुड्डीवाला आंध्र प्रदेश के स्वामी प्रणवानंद महाराज से वेद वेदांत की शिक्षा ग्रहण की। वो वेदांत के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। उनके निधन से अध्यात्म जगत को भारी हानि हुई है। स्वामी दयानंद सरस्वती के निधन से आध्यात्मिक जगत में शोक के लहर छा गई है।

पीएम मोदी ने दयानंद गिरि के निधन को व्यक्तिगत क्षति बताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए की प्रार्थना की। वहीं राज्य के मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट, भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी ने स्वामी के निधन पर दुख जताया।