राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के उत्तराखंड सदन में शनिवार को एप्पल डे कार्यक्रम आयोजित कर राज्य में सेब के उत्पादन को बढ़ाने के प्रयासों को दिखाने की कोशिश की गई। राज्य के कृषि मंत्री हरक सिंह रावत ने इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

प्रदर्शनी में उत्तराखंड के लोग काफी तादाद में पहुंचे और सेब की खरीददारी की। कृषि मंत्री ने कहा कि राज्य में भौगोलिक परिस्थितियां और जलवायु सेब के उत्पादन के लिए अनुकूल है, लेकिन इसका उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं होता।

उन्होंने कहा कि इसकी बागवानी बढ़ाने के लिए किसानों को सब्सिडी की भी व्यवस्था की गई है। साथ ही उद्यान विभाग द्वारा अमेरिका, इटली और नीदरलैंड से बेहतर प्रजातियों के पौधों का आयात किया गया है। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों की ऊंचाई के आधार पर उपयुक्त प्रजातियों की बागवानी की जाएगी।

उत्तरकाशी के नौगांव में सेबों के भंडारण के लिए कंट्रोल्ड एटमॉसफेयर कोल्ड स्टोरेज है, जिसके अलावा एक और भंडारण केंद्र काशीपुर में स्थापित करने का प्रस्ताव है। गौरतलब है कि देश में कुल सेब का उत्पादन करीब 25.42 लाख मीट्रिक टन होता है। इसमें जम्मू-कश्मीर में करीब 1.61 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में देश के कुल सेब का 65 फीसदी उत्पादन होता है। वहीं हिमाचल प्रदेश में कुल सेब का 29 फीसदी उत्पादन किया जाता है।

उत्तराखंड में कुल उत्पादन का केवल 4.81 प्रतिशत सेब पैदा होता है। राज्य में सेब की कम उत्पादकता की वजह पुराने और अनुत्पादक बगीचों का होना है, जिसमें मुख्यतौर पर डेलिसियस प्रजाति के बगीचे स्थापित हैं। इसके अलावा कम उपजाऊ और ढलाऊ भूमि, सिंचाई सुविधा का अभाव, जलवायु परिवर्तन की वजह से स्नो लाइन का स्थानान्तरित होना और वृक्षों की शीत आवश्यकता की पूर्ति न होना और उद्यानों में कीटों का प्रकोप इत्यादि समस्या है।

साथ ही ये भी दिक्कत है कि राज्य में लघु और सीमांत कृषकों की अधिकता है, जिनकी भूमि बिखरी हुई है। इससे उद्यान प्रबंधन नहीं हो पाता और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। गौरतलब है कि भारत में सबसे पहले अंग्रेजों ने सेब की बागवानी शुरू की थी। उत्तराखंड यानी तत्कालीन उत्तर प्रदेश में इसकी बागवानी 1855 में शुरू हुई। भारत का 95 प्रतिशत सेब उत्तर-पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्रों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में ही उत्पादित किया जाता है।