पिथौरागढ़ : 500 बच्चों और माताओं को ‘जीवन दान’ दे चुकी हैं धनुली अम्मा

वैद्य और दाई प्रथा हजारों साल पुरानी है और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में यह प्राचीन प्रथा आज भी चली आ रही है। बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के चलते यहां धनुली आमा (अम्मा) ग्रामीणों के लिए आज भी वरदान बनी हुई हैं।

इन इलाकों में ऐसे कई वैद्य और दाइयां है जो लोगों की छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज भी जड़ी-बूटी से कर देते हैं। गणाईगंगोली के कूना निवासी 90 वर्षीय धनुली आमा का नाम ऐसी दाइयों में शुमार है, जिन्हें अस्पतालों से हायर सेंटरों के लिए रेफर प्रसव पीड़िताओं का भी सफल प्रसव कराने में महारत हासिल है।

अब तक 500 से ज्यादा सुरक्षित प्रसव करा चुकीं धनुली आमा एक कुशल वैद्य भी हैं। उनको जड़ी-बूटियों का अच्छा ज्ञान है। इस उम्र में भी आमा सुरक्षित प्रसव करा देती हैं। स्थानीय अस्पतालों से अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के अस्पतालों के लिए रेफर प्रसव के मामले हाथ में लेने से भी वह नहीं हिचकती और सुरक्षित प्रसव करा देती हैं।

स्कूल का मुंह तक न देखने वाली धनुली आमा कहती हैं कि बुजुर्गों से उन्हें जड़ी-बूटी का ज्ञान मिला है, लोगों को इसका लाभ देने में उन्हें खुशी मिलती है। वे कहती हैं सरकार को इस प्राचीन विधा को संरक्षण देना चाहिए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राज्य में घरेलू वैद्य और दाइयों को संरक्षण देने की घोषणा की है, इसे देखते हुए दाई और वैद्य भी संगठित होने लगे हैं।

वैद्य और दाइयों को संगठित करने का बीड़ा उठाने वाले ढिंगालगांव निवासी वैद्य बची सिंह बिष्ट बताते हैं कि इस समय गणाईगंगोली क्षेत्र में प्रताप राम, दलीप सिंह बोरा, भोपाल सिंह, मनोज डसीला, हरीश पांडे, जमुना दत्त, पूरन लाल, अनुली देवी, तारा देवी, खष्टी देवी, मीरा तिवाड़ी, मोती राम समेत 20 लोग वैद्य का काम करते हैं।

महिलाएं दाई के काम में माहिर हैं। बताते हैं कि वैद्य और दाइयों को तीन हजार रुपये मानदेय देने के साथ ही किट उपलब्ध कराने, आरोग्य कुटीर के लिए वित्तीय मदद देने की मांग मुख्यमंत्री से की गई है। गंगोलीहाट के विधायक नारायण राम आर्य कहते हैं, ‘वैद्य और दाइयों को संरक्षण देने के लिए मुख्यमंत्री कृतसंकल्प हैं। जल्द ही इनको आर्थिक मदद और संसाधन उपलब्ध होंगे।