देवभूमि उत्तराखंड में देवी-देवताओं से जुड़ी कई कहानियां हैं। यहां तमाम ऐसे मंदिर हैं जहां दुनियाभर से लोग दर्शनों व पूजा के लिए पहुंचते हैं। यहां उत्तरकाशी जिले में एक अनोखी परंपरा आज भी देखी जा सकती है। यहां इंसान तो इंसान ‘भेड़-बकरियां’ भी पशुपालकों के साथ मीलों चलकर देवता की पूजा करने जाती हैं। सीमांत उत्तरकाशी के कई क्षेत्रों में ये परंपरा आज भी जारी है।

यह है दयारा बुग्याल का बेस कैंप पर्यटन ग्राम ‘रैथल’। यहां मंगलवार को दिनभर उत्सव का माहौल रहा। इस उत्सव में भेड़ और बकरियां भी शामिल रहीं। रैथल के समेश्वर देवता के मंदिर प्रांगण में पांच गावों रैथल, भटवाडी, क्यार्क, बंद्राणी व नटीण के लोग जमा होते हैं।

ग्रामीणों के साथ ही यहां 15 हजार फीट की ऊंचाई पर बुग्यालों में चरने गई हजारों भेड़-बकरियां भी पहुंची हैं। सभी भेड़ें अपनी-अपनी टोलियों में मंदिर परिसर में प्रवेश करती हैं और फिर परिक्रमा कर समेश्वर देवता का आशीर्वाद लेकर लौट जाती हैं।

मान्यता है कि समेश्वर देवता भी अपने पूर्व जन्म में पशुपालक हुआ करते थे। इस पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भेड़ पालन होता है। भेड़-बकरियां बुग्यालों में सुरक्षित रहें। कोई अनिष्ठ न हो, इसके लिए साल में एक बार समेश्वर देवता का आशीर्वाद लिया जाना जरूरी माना जाता है।

देवभूमि कदम-कदम पर मठ और मंदिरों से सुशोभित है तो अनेकों परंपराएं और प्रथाएं भी यहां जीवन का अभिन्न अंग हैं। जो हाड़तोड़ मेहनत के बीच लोगों को उत्साह और उमंग से भर नई ऊर्जा प्रदान कर जाते हैं। यह अनोखी परंपरा भी उसी जीवन का हिस्सा है।