उत्तराखंड में चमोली जिले के आदि बद्री समूह मंदिर की पांच बेशकीमती मूर्तियां गायब हैं। देहरादून के सदर मालखाने से दुर्लभ मूर्तियां गायब कर दी गईं या फिर सांठगांठ कर उन्हें बेच दिया गया, इस बात की किसी को कोई जानकारी नहीं है।

पिछले पांच साल से मामले की जांच चल रही है। जांच के नाम घोर लापरवाही बरती जा रही है। अचम्भे की भरी बात यह है कि पुलिस अधिकारी अब मूर्ति चोरी मामले की जानकारी होने से भी इनकार कर रहे हैं।

यह बहुचर्चित मामला चमोली के प्राचीन आदि बद्री मंदिर समूह का है। यहां 14 मंदिर हैं। 30 जनवरी 1967 की रात मंदिरों से गौरीशंकर, अंजनी माता, रामलाल और कुबेर की मूर्तियां चुरा ली गई थीं। इस मामले में केस दर्ज होने के बाद श्रीनगर पुलिस ने 1975 में पांचों मूर्तियां बरामद कर देहरादून के मालखाने में जमा करा दी थीं।

2010 में मूर्तियां पुरातत्व विभाग द्वारा गठित कमेटी के अध्यक्ष मदन सिंह चौहान, सहायक पुरातत्वविद् मनोज सक्सेना, चक्रधर थपलियाल पुजारी आदि बद्री मंदिर समूह और जनहित विकास संस्थान के अध्यक्ष एसपी लवानी की मौजूदगी में पांचों मूर्तियां सुपुर्द की गई थी।

पुजारी चक्रधर ने जांच के बाद कहा कि यह मूर्तियां आदि बद्री समूह मंदिर की नहीं हैं। यह मूर्तियां श्रीनगर गढ़वाल के बद्रीनाथ मंदिर की हैं, जो 8 जनवरी 1988 को चुराई गई थीं। यह मूर्तियां पुरातत्व विभाग के सुपुर्द कर दी गई हैं।

असली और नकली का यह मुद्दा उछला तो तत्कालीन एसपी सिटी अजय जोशी ने बयान दिया था कि आदि बद्री समूह की पांचों मूर्तियां पुरातत्व विभाग को लौटा दी गई हैं। 15 मार्च 2011 को चमोली के एसपी ने देहरादून के एसएसपी को चिट्ठी लिखकर पूरे मामले की जांच कराने के लिए कहा।

आदि बद्री मंदिर समूह समिति द्वारा भी मंदिर की असली मूर्तियां देने का अनुरोध किया गया। उस समय अधिकारियों ने जांच कराकर कार्रवाई का भरोसा दिया था। पांच साल का समय पूरा होने को है, लेकिन यह साफ नहीं हो पाया है कि पांचों मूर्तियां कहां हैं।

मालखाने को चेक कराकर यह सुनिश्चित करने की जहमत नहीं उठाई गई कि मूर्तियां हैं भी या नहीं। यह रहस्य गहराता जा रहा है कि संरक्षित यह बेशकीमती मूर्तियां आखिर गईं तो गईं कहां।