लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश-मानसरोवर यात्रा संपन्न, 783 लोगों ने की पवित्र यात्रा

नैनीताल।… उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत तक होने वाली इस साल की पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा मंगलवार को आखिरी जत्थे के वापस लौटने के साथ ही संपन्न हो गई।

मानसरोवर यात्रा के लिए नोडल एजेंसी कुमाऊं मंडल विकास निगम के प्रबंध निदेशक धीरज गबरियाल ने नैनीताल में बताया कि गत 12 जून से शुरू हुई इस यात्रा के दौरान 18 जत्थों में 26 राज्यों के कुल 783 यात्रियों ने तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत की परिक्रमा की और पवित्र मानसरोवर झील में डुबकी लगाई।

निगम के क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी डीके शर्मा ने बताया कि 1962 भारत-चीन युद्ध के बाद वर्ष 1981 में यह यात्रा दोबारा शुरू हुई थी और इस वर्ष यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या यात्रा के इतिहास में अब तक की दूसरी सर्वाधिक संख्या है। वर्ष 1981 से लेकर अब तक 415 जत्थों में कुल 14,722 तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर यात्रा कर चुके हैं।

अधिकारियों ने बताया कि इस साल मेडिकल आधार पर छह श्रद्घालुओं को गुंजी से आगे नहीं जाने दिया गया जबकि तीर्थयात्रा कर वापस आ रही एक महिला की रास्ते में ही मौत हो गई। कैलाश पर्वत को भगवान शिव का घर मानने वाले हिंदुओं के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा का बहुत महत्व है। हालांकि साल 1981 में यात्रा के दोबारा शुरू होने के बाद से वहां जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सीमित रही है, लेकिन फिर भी उनकी संख्या में धीरे-धीरे इजाफा हो रहा है।

शर्मा ने बताया कि साल 1981 में केवल 59 श्रद्घालु यात्रा पर गए थे लेकिन दस साल में ही 1991 तक तीर्थयात्रियों की संख्या बढकर 227 तक पहुंच गई और साल 2010 में यह संख्या बढकर 753 हो गई।

तिब्बत में मानसरोवर झील समुद्रतल से 4590 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और वहां तक पहुंचने के लिए तीर्थयात्रियों को कई किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है।