परिवार नियोजन के लिए बाजार में ढेरों गर्भनिरोधक गोलियां मौजूद हैं। ये गोलियां अनचाहे गर्भ की चिंता से छुटकारा दिलाने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन चिंताजनक बात ये है कि महिलाओं को अनचाहे गर्भ से छुटकारा दिलाने वाली ये गोलियां गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियों की गोद को सूना कर सकती हैं। जी हां ये खतरा अब लगातार बढ़ता जा रहा है।

गर्भनिरोधक गोलियों में मौजूद हार्मोन घरेलू सीवेज के जरिये नदियों तक पहुंचने से जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा हो गया है। समय रहते उपाय नहीं किए गए तो हमारी प्यारी नदियों की ‘गोद’ सूनी हो सकती है। इससे पर्यावरण संतुलन पर बुरा असर पड़ सकता है।

नदियों को प्रदूषणमुक्त रखने में जुटी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लिए गर्भनिरोधक हार्मोन जैसे सूक्ष्म प्रदूषक नई चुनौती बन गए हैं। यूरोपीय संघ ने तो नदियों में ऐसे हार्मोनों की निगरानी के निर्देश जारी कर इस दिशा में कदम उठाने भी शुरू कर दिए हैं। विकसित देशों खासकर यूरोप में महिलाएं व्यापक स्तर पर गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करती हैं। इसलिए यहां की नदियों के लिए खतरा ज्यादा है। धीरे-धीरे यह चलन भारत जैसे विकासशील देशों में भी बढ़ रहा है। इसलिए अभी से इससे निपटने की तैयारी करनी होगी।

गर्भनिरोधक गोलियों में इथायनल एस्ट्राइडिओल (ईई2) होता है। जब महिलाएं इनका सेवन करती हैं, तो यह सूक्ष्म प्रदूषक तत्व मल-मूत्र के जरिए घरेलू सीवेज में पहुंचता है। मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट इसे साफ करने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए यह नदियों में चला जाता है। हाल में कई शोधों में यह निष्कर्ष सामने आया है कि ईई2 का मछलियों पर भी असर पड़ता है, जिससे उनकी संख्या कम होने लगती है।

कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी में इस तरह के शोध हुए हैं। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू ब्रुंसविक-सेंट जॉन में कनाडियन रिवर्स इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक केरेन किड ने पिछले साल अपने शोध में पाया कि गर्भनिरोधक गोलियों का मछलियों पर असर पड़ रहा है, जिससे उनकी संख्या घट रही है।

इंटरनेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ द राइन (आइसीपीआर) लंबे समय से इस संबंध में कदम उठाने की वकालत कर रहा है। आइसीपीआर का कहना है कि जब भी लोगों को गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल की जानकारी दी जाए, उन्हें इनके पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में जरूर बताया जाए। आइसीपीआर की सचिव एनी शुल्ट-वुल्वर-लेडिग ने एक हिंदी दैनिक को बताया कि यूरोपीय संघ ने मार्च 2015 में ऐथिंलेस्ट्रो डिओल, एस्ट्रोंडिओल और एस्ट्रोजन को अपनी निगरानी सूची में शामिल कर लिया है। राइन के जल में एस्ट्रोजन का स्तर कितना है, इसकी जांच अब तक नहीं होती थी, लेकिन अब इनकी निगरानी की जाएगी।

जर्मनी का फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (बीएफजी) राइन नदी के जल की 24 घंटे निगरानी रखता है। अब यह संस्थान ही गर्भनिरोधकों से निकलने वाले हार्मोनों तथा सूक्ष्म प्रदूषकों की निगरानी करेगा। बीएफजी के जल गुणवत्ता निगरानी और रेडियोलॉजी विभाग के प्रमुख डा. मार्टिन कीलर ने कहा कि 2016 से राइन नदी के जल में ऐथिंलेस्ट्रोडिओल, एस्ट्रोडिओल और एस्ट्रोजन की मात्र मापने की शुरुआत होगी। इसके लिए अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक विधि तैयार की जा रही है।