कुमाऊं-गढ़वाल में कभी भी आ सकता है बड़ा भूकंप : रिपोर्ट

एक संसदीय रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 200 सालों में भूकंप के कारण 50 फीसदी से कम हिमालयी वृत्तखण्ड, जिसमें उत्तराखंड का कुमाऊं-गढ़वाल क्षेत्र शामिल है, को नुकसान हुआ है और इस क्षेत्र में एक बड़े भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण एवं वन संबंधी संसदीय समिति के सवालों के जवाब में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव शैलेश नायक ने समिति को बताया कि उत्तराखंड में भूकंप की पहले ही चेतावनी दे देने वाली व्यवस्था कायम की गई है। चेतावनी कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट से थोड़े कम समय पहले दी जा सकती है।

नायक ने कहा कि पिछले पांच करोड़ साल से यूरेशियाई प्लेट के नीचे भारतीय प्लेट के उत्तर की तरफ खिसकने और ‘अंदर ही अंदर धक्के’ से हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ऊर्जा इकट्ठी हो गई है, जिससे यह क्षेत्र अत्यधिक भूकंप संभावित क्षेत्र हो गया है। बड़े और भयंकर भूकंपों में यह ऊर्जा धीरे-धीरे बाहर आती है।

नायक ने समिति को बताया, ‘ऐसा पाया गया है कि पिछले 200 सालों की अवधि के दौरान बड़े पैमाने पर आए भूकंपों के दौरान 50 फीसदी से भी कम हिमालयी वृत्तखण्ड में दरारें आई हैं। इन क्षेत्रों में भीषण भूकंप की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।’

उन्होंने कहा, ‘1905 में कांगड़ा और 1934 में नेपाल-बिहार के भूकंपों के दरारों के बीच हिमालय के हिस्से में पिछले कुछ सालों में तनाव कम नहीं हुआ है और इसका नाम सेंट्रल सिस्मिक गैप रखा गया है। क्षेत्र में जीपीएस मापने से क्षेत्र में तनाव के संचित होने के प्रमाण मिले हैं।’