कारगिल दिवस पर विशेष : प्राण दे दिए पर नहीं घटने दी तिरंगे की शान

अनुज खंडेलवाल लैंसडौन।… कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स के सैनिक अदम्य साहस व विलक्षण बहादुरी का परिचय देते निर्णायक साबित हुए, सैनिकों ने पूर्वजों की परंपरा को कायम रखते दुश्मनों को घुटने टेकने के लिए भी विवश कर दिया।

ऑपरेशन विजय के दौरान बहादुरी से लड़ते दो अधिकारियों समेत 53 सैनिकों ने जीवन की सर्वोच्च कुर्बानियां दी। युद्ध में रेजीमेंट को बैटल ऑनर, वीर चक्र समेत विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

साल 1999 के आपरेशन विजय में गढ़वाल राइफल्स की छह बटालियन कारगिल के बटालिक व द्रास सैक्टर में तैनात थी। इस आपरेशन में 10, 17 और 18 बटालियन ने 29 जून से 13 जुलाई 1999 के मध्य वीरता का परिचय देकर दुश्मनों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया। युद्ध में तीनों बटालियनों के अलावा गढ़वाल स्काउट के विशेष सैनिकों की एक प्लाटून ने भी हिस्सा लिया।

रेजीमेंट के सैनिकों ने दुश्मनों को मुंह तोड़ जबाव देते कब्जों में ली गई, एक-एक इंच जमीन वापस ली। युद्ध के दौरान दसवीं बटालियन नियंत्रण रेखा में तैनात थी, दसवीं बटालियन की जिम्मेदारी के इलाकों को छोड़कर बटालिक से लेकर मुश्कोह घाटी तक पाकिस्तानी सैनिक हर जगह भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने में कामयाब हो गए थे, जबकि सत्रवीं बटालियन को सब सेक्टर के. जुबार, थारू, और कुकरथांग के कालापत्थर और बम्ब एक-दो और तीन पर कब्जा करने की जिम्मेदारियां गई थी।

बटालियन ने 13 जुलाई 1999 को सैन्य रणनीति को दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश और विषम मौसम के बीच कब्जा करने में सफलता हासिल की। अठारवीं बटालियन को द्रास सब सेक्टर की नियंत्रण रेखा को फिर से बहाल करने की जिम्मेदारी मिली।

अठारहवीं बटालियन ने साहसिक कार्रवाई करते प्वांइट 5140 और प्वांइट 4700 को अपने कब्जे में ले लिया। जबकि गढ़वाल स्काउट के विशेष सैनिकों की एक प्लाटून जो उच्च पहाड़ी और उच्च तुंग रणकौशल में विशेष दक्षता रखती थी, को काकसर उप क्षेत्र में तैनात किया गया। पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाने के लिए इस प्लाटून ने मिशन को सफलतापूर्वक संपन्न किया।

18वीं बटालियन के कप्तान सुमित रॉय ने साहस एवं बहादुरी के साथ अपनी टुकड़ी को दुश्मन के भारी हमले के बावजूद कड़ा मुकाबला करते हुए आगे बढ़ाया। अपने मिशन की सफलता के दौरान कप्तान सुमित रॉय शहीद हो गए। मरणोपरांत कप्तान को वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

इस बहादुर सैनिक के सम्मान में फतह करने वाली चोटी का नाम बदलकर सुमित चोटी रखा गया है। जबकि 17 वीं बटालियन की बागडोर संभालने वाले कप्तान जिंतू गोगाई भी युद्ध के दौरान शहीद हुए। कप्तान जिंतू गोगाई की शहादत व बहादुरी के चलते इन्हें भी मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया।

सौजन्य दैनिक जागरण